Sunday, September 12, 2021

पांचाली प्रतिज्ञा- तृतीय सर्ग

 

राजसभा ने द्वारपाल से,
पांचाली का प्रश्न सुना।
होकर शर्मिंदा धर्मराज का,
लाचार, दीन-सा शीश झुका।

सुन पांचाली का प्रश्न यह,
हो गयी विमूढ़ स्तब्ध सभा
न्याय, तर्क से आँख मूंदकर,
वह रोक रही द्वन्द अंतर का।

विद्वान पंडितों की मंडली,
चुप बैठी, कुछ ना बोल रही
एक नारी नर निर्मित नीति,
मानो तिल-तिल कर तोल रही

छा गया सभा में कुछ पल को,
हा! आत्म-ग्लानि का मौन सघन
प्रश्न जटिल था, क्या उत्तर दें?
कर रहे तर्क पर सभी मनन।

पांचाली का प्रश्न खरा था,
तर्कसंगत था, तर्क बड़ा था
पर वाणी पर राजसभा के,
तालों का अम्बार जड़ा था

वह केवल एक प्रश्न नहीं था,
था कटु सत्य का वह आघात
एक वीर भी नहीं सभा में,
जो बोल सके सच, सत्य बात?

देख सभा को असहाय विकल,
यह कहते हुए उठा विकर्ण-
द्यूत व्यसन की आग में सबका,
क्या ज्ञान धर्म हो गया भस्म?

न्याय-दायिनी राजसभा क्यों,
धर छाती पर बैठी पत्थर?
क्या नहीं यहाँ ज्ञानी गुरुजन,
जो दें पांचाली का उत्तर?

पल भर भूल पांचाली को,
हो प्रश्न यह यदि जनता का?
सभा बधिर-सी बनी रहे तो,
क्या नहीं दृश्य यह चिंता का?

राजसभा ही मुँह मोड़ेगी,
यदि नैतिक जिम्मेदारी से
कैसे चलेगी न्याय व्यवस्था,
यूं चुप्पी और लाचारी से?

न्याय न कर पाना प्रजा का,
नृप-पतन का सूचक होता है।
श्रृगाल-खाल को ओढ़ शेर,
अपनी ही गरिमा खोता है।

शब्द विकर्ण के लगे सभा को,
ज्यों पिनाक से निकले तीर।
होकर कठोर, कटु नृप-निंदा,
कर रहा सभा में विकर्ण वीर।

सुन विकर्ण के निष्ठुर बोल,
भर उठा कर्ण के मन में रोष।
कर्ण उठा सहसा बोला- हे!
लगा रहे तुम नृप पर दोष?

क्या है सही और क्या यथार्थ,
तुमको नही है कुछ भी बोध।
तुम अनुभव से शून्य, हे विकर्ण!
हो अभी सरल, बालक अबोध।

कर सभा को संबोधित 'गीदड़'
है स्वाभिमान तुमने कुचला
अरे विकर्ण! यह गढ़ वीरों का,
दौड़े हर छाती में चपला।

सिंह दन्त गिने जिस बालक ने,
तुम उसी भरत के वंशज हो।
करते हो क्यों बात अनर्गल?
तुम वीर कुरु के अंशज हो।

क्या हुआ है तुमको, हे विकर्ण!
मत भूलो भुजदंडो का बल।
हर्षोल्लास-विजय वेला में,
क्यों मन करते गंभीर प्रबल?

हे कर्ण! क्योंकि मैं देख रहा,
नभ में घिरते प्रलय के घन।
फिर तुम ही बोलो कैसे रखूँ,
मैं शांत चित्त और हर्षित मन।

कुरु सभा अपमानित करना,
हे कर्ण! न था मेरा व्यवहार
अन्याय हुआ एक नारी पर,
हुआ मैं यूं नृप-निंदाकार

यदि न्याय-मठ में ही न होगा,
धर्म, नीति और न्याय का वास।
जग में भला कौन रखेगा,
न्याय, नीति में फिर विश्वास?

बोलो, सच को अनदेखा कर,
दबा सका सत-शक्ति कौन?
उपस्थित यहाँ सभी उत्तर दें,
हे सभाजनों! मत बैठो मौन?

है प्रश्न द्रौपदी का सबसे,
पर नहीं एक भी यहाँ गंभीर?
इतिहास रच रहे हम ऐसा,
कहलाने को क्या भीरु-वीर?

धृतराष्ट्र, भीष्म, कृपाचार्य,
गुरु द्रोण सदृश हैं वीर यहाँ।
यदि कुल में ही न्याय न होगा,
फिर और कहीं पर न्याय कहाँ?

सुनकर विकर्ण के तर्कों को,
उठ खड़ा सभा में कोलाहल।
कानाफूसी, खुसर फुसर कर,
दे रहे सभी जन सत्य को बल।

कुछ शोर हुआ मंद जैसे ही,
क्रोध से भर कर बोला कर्ण।
द्रौपदी की बाजी नीतिबद्ध,
हो गये हो तुम मति-भ्रष्ट विकर्ण।

भीष्म, द्रोण-से विद्वानों को,
न्याय का मत दो तुम उपदेश।
सभी बड़े और ज्ञानी तुमसे,
उनका मानो मौन आदेश।

न अब आगे कुछ करो कुतर्क,
सही है दुर्योधन की जीत
ओ कौरव कुल चिराग, शांत!
स्वजनों से रखो कुछ तो प्रीत

हुआ कुपित अति द्वारपाल पर,
बोला दुर्योधन झुँझलाकर
हाँ हाँ, करे प्रश्न जितने भी,
पर करे सभा में ही आकर।

उठ, दुर्योधन ने ताव खींच,
दुःशासन को आदेश दिया
ला पांचाली को खींच अनुज,
बैठे हैं जिसके पांच पिया।

हे भ्राता मेरे कदमो में,
लाकर पांचाली को रख दे।
क्या होता है अपमान गरल,
इस भरी सभा को लखने दे।

उठा दुःशासन गर्वित हो कर,
कर्म भ्रात ज्येष्ठ ने श्रेष्ठ दिया।
क्या याद करेगी दुनिया भी,
दुर्योधन ने प्रतिशोध लिया।

छाती में एक तूफान उठा,
आँखों में प्रलय की हुंकार।
राजतन्त्र की देख विवशता,
भीष्म मारता बस फुंकार।

गज सा भाल, आँखो में ज्वाल,
रुधिर बिजली सा फड़क रहा
सौ गज पर भारी क्रुद्ध भीम
का सीना धड़ धड़ धड़क रहा

ललकार कहा दुर्योधन को,
ओ नीच! तेरी ऐसी मजाल?
छिन्न छिन्न कर दूँ अंग तेरा,
जो पांचाली का किया ख्याल।

विवश हुआ अर्जुन भी जिसकी,
धनु-विद्या छूती थी आकाश।
एक प्रत्यंचा अगर खींच दे,
ला सकता था महा विनाश।

झल्लाकर दुर्योधन बोला-
करते हो सभी बखान बड़ा!
इस पौरुष का पुरूस्कार दूँ,
या, दे दूँ तुमको दंड कड़ा?

दास बने अब तुम सब मेरे,
और द्रौपदी मेरी दासी है।
गवाह यहाँ विद्वत-जन की,
ये भीड़ भी अच्छी खासी है।
 

यह अनीति या अन्याय नही,
सब कुछ द्यूत में जीता है।
जीती है मैंने पांचाली भी,
बस समय अभी कुछ बीता है।

संवाद युधिष्ठिर यह सुनकर,
अति व्याकुल होते जाते थे।
दांव लगा दी क्यों पांचाली,
वे बार बार पछताते थे।

क्या होता है पछताने से,
जब समय निकल यह जाता है।
एक बार शर छूट गया जो,
वह लौट कहाँ फिर आता है?

इस व्यसन का था परिणाम यह,
बुद्धि ही उनकी गयी मारी।
नीति-न्याय को भूल द्यूत में,
हा! दांव लगा दी एक नारी।

देते हैं दोष हम औरों को,
जब काम बिगड़ कुछ जाता है।
किन्तु सत्य है स्वयं मनुज ही,
अपना भाग्य निर्माता है।

हाय! गयी मारी मति उनकी,
जो दाँब लगा दी पांचाली
बिलख रहे मन ही मन पांडव,
हा! पांच पुरुष अति बलशाली

विदुर उठ दुर्योधन से बोले-
क्या कुकर्म क्षत्रिय को भाते हैं?
नारी को अपमानित करते,
वे लोग रसातल जाते हैं।

क्या भूल गए हो दुर्योधन,
तुम धर्म और मानवता को?
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,
रमन्ते तत्र देवता' को?

हे विदुर! नीति के तुम ज्ञाता,
बस नीति ही अंगीकार करो।
ये सभा गवाह, मैं जीता हूँ,
तुम जीत मेरी स्वीकार करो।
  

श्री विदुर बोले– धिक्कार मुझे,
यदि जीत तेरी स्वीकार करूँ।
छोड़ नीति और नैतिकता को,
मैं अनीति अंगीकार करूँ!

फिर स्वर दुर्योधन का गूंजा,
क्रोध और तिरस्कृति से मिश्रित।
अरे नीति में निपुण विदुर तुम,
मत भूलो, हो मेरे आश्रित।

विदुर कहो वो क्या नैतिकता,
जो दे न सके सबको सम्मान?
लिया अंगूठा एकलव्य का,
अर्जुन धनुर्धर रहे महान!

नैतिकता है तप का जीवन,
बस जी सकता फक्कड़ फ़कीर।
यश के लालायित पत्थर पर,
क्या कभी खींच पाये लकीर!

ये वही सभा, वही लोग हैं,
सब नीति-नियम रचने वाले।
जाति-पाति का भेदभाव कर,
नर प्रतिभा को छलने वाले।

जो ठुकराती बाहुबल को,
वो नैतिकता ठुकराता हूँ
विदुर! मैं बाहुबल-विश्वासी,
पौरुष को हृदय लगाता हूँ।

है राज-वीथियों में बल ही,
नियम-नैतिकता का आधार
अगर नही ये, नही किया क्यों,
वीर कर्ण-सा फिर स्वीकार?

पांडवों को इंगित कर बोला,
क्या नही यहाँ सबने देखा?
दासों में भी बसती ज्वाला,
क्या कुल, क्या हाथों की रेखा!


तभी हुआ कुछ कोलाहल-सा,
जिसमें नारी का क्रंदन था।
ला रहा दुःशासन उसे खींच,
जिसका इस कुल में वंदन था।

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