पड़ी द्रौपदी बेवश भू पर,
दुःशासन उसे घसीट रहा।
पांडव बैठे शीश झुकाए,
था भीष्म भी माथा पीट रहा।
पांचाली के केश पकड़कर,
वह दुष्ट दुःशासन खींच रहा।
कुल-वधु हो रही अपमानित,
कुल सारा आँखें मींच रहा।
हा! हा! विडम्बना ये कैसी,
अपनों के बीच लुटी नारी।
सब देख रहे योद्धा कुल के,
अन्याय द्रौपदी पर भारी।
जिस सिंघासन से संचालन,
आर्यावर्त का होता था।
मूक, बधिर-सा बना आज वह,
बस घोर विवश हो रोता था।
पांचाली झुक फरियाद करे-
न्याय मुझे दे दो महाराज!
नहीं पितामह रक्त खोलता?
लुट रही सुता की देख लाज?
हे महाराज, धनुर्धर वीरों,
ज्ञानी गुरुओं तुम क्यों सोते?
खेलें शतरंज, इज्जत लूटें,
इस हित दरबार नहीं होते।
छल, कायरता, ये वीरों के,
शोभा, श्रृंगार नहीं होते।
हे दुःशासन! बल प्रदर्शन को,
नारी पर वार नहीं होते।
यदि देख नहीं सकते नरेश,
यूं बधिर तो मत बन जाओ तुम।
विनाश दहाड़े राजद्वार पर,
आवाज काश! सुन पाओ तुम।
पितामह! ये कैसी विवशता,
हैं सभी सभासद मौन यहाँ।
सभी बिके बैठे महलों में,
फिर न्याय करे अब कौन यहाँ।
हे कृपाचार्य! हे गुरु द्रोण!
नैतिकता के उपदेश कहाँ?
धर्म सिखाने वाले गुरुओं,
है धर्म कहाँ? सन्देश कहाँ?
हे पितामह! खो गयी कहाँ,
तेरी सिंह से गहरी गर्जन?
धर्माचरणी राजसभा में,
बैठे क्यों दुष्ट और दुर्जन?
विद्वान विदुर कुछ तो बोलो!
क्यों शांत मौन हो तकते हो?
राजनीति के ज्ञाता, बोलो?
क्या सच से तुम भी डरते हो?
हे द्रोण! द्यूत पर जो बैठे,
वे सब ही शिष्य तुम्हारे हैं।
यह जमघट है शैतानों का,
सब पांडव जिससे हारे हैं।
बोलें धर्मराज! युधिष्ठिर ही,
जो कभी धर्म से हटे नही।
फिर क्यों किया अधर्म घोर ये?
क्यों आज धर्म पर डटे नही?
यदि न्यायालय ही बिक जाये,
फिर न्यायालय में जाना क्या?
राजा यदि बहरा हो जाये,
तो फिर फरियाद लगाना क्या?
सहती थी वह अन्याय अति,
थे पांच वीर जिसके स्वामी।
वे बैठे थे लाचार हुए,
जो सारे जग में थे नामी।
शोकाकुल चिंता में डूबे,
वे लज्जा से गड़ते जाते।
अब क्या उनको कहे द्रौपदी,
जो शीश पकड़ स्वयं पछताते।
असमर्थ कातर रही मांगती,
भरी सभा से धर्म की भीख।
न किसी कान तक भी पहुंची,
द्रौपदी रही व्योम तक चींख।
क्या मान तुम्हारा ही सारा,
है मुझमे कुछ भी
शेष नहीं?
धिक्कार! देखकर पाप जिसे,
आता कण भर आवेश नहीं।
क्रुद्ध दुःशासन दंभी बोला,
द्रौपदी तेरा प्रलाप व्यर्थ।
कर सके आज जो तेरी रक्षा,
दुनिया में ऐसा कौन समर्थ?
अब दासी तू दुर्योधन की,
पांचाली मत हो दिशा-भ्रांत!
धर्म न्याय से जीता तुझको,
इसलिए सभी सभासद शांत।
स्वेच्छा से चल तेरा दांव,
जब तुझे गए युधिष्ठिर हार।
कैसे हुआ अधर्म, यह बतला?
इसमें कहाँ गलत व्यवहार?
अब सत्य यही है पांचाली,
कि तुझे द्यूत में जीता है।
बेकार यहाँ पर तर्क तेरे,
हर तर्क तथ्य से रीता है।
भरते थे वचन दुःशासन के,
उस कौरव दल में नव उछाह।
परिहास सह रहे सब पांडव,
पांचाली अपमान अथाह।
कोलाहल करके शांत जरा,
कर्ण हुआ खड़ा, हो गंभीर।
राजसभा को लगा बताने,
दास नियमों की लीक लकीर।
आभूषण और राजवस्त्रों पर,
नहीं है दासों का अधिकार।
वस्त्र राजसी त्याग द्रौपदी,
अब दासत्व करे स्वीकार।
वह बोला- ओ वीर दुःशासन,
लो पांचाली के वस्त्र
उतार।
खड़ी कर रही राज-वेष में,
राज नियमों की सीमा पार।
कर्ण वचन सुन खड़ी अकिंचन,
पांचाली अचरज में डूबी।
द्रोण, भीष्म, विदुर, कृप, नृप की,
हा! कहाँ गयी सबकी खूबी?
बड़ी अकड़ में बढ़ा दुःशासन,
पकड़ने को साड़ी का छोर।
पा असहाय गीदड़ झुण्ड में,
सिंहनी हटी पीछे की ओर।
अब चीर हरण तेरा होगा,
मैं देखूं कौन बचाता है?
अट्टहास कर दुष्ट दुःशासन,
आगे ही बढ़ता जाता है।
विजय दर्प में चूर दुःशासन,
जब पांचाली की ओर बढ़ा।
देख यह पांचाली गरजी,
रुकजा कामी, रह वहीं खड़ा।
कुपित हुआ सिंधु लहरों-सा,
सुन पांचाली की फटकार।
हाथ उठाकर बढ़ा दुःशासन,
अधम, नारी पर करने वार।
जब क्रुद्ध दुःशासन ने खींचा,
द्रौपदी की साड़ी का छोर।
संभल न पायी, गिरी, धरा पर
टकराया माथा बड़ी जोर।
हाय भूमि पर गिरी पड़ी जो,
वह नारी थी कुल मर्यादा।
कुल वाले सब देख रहे थे,
कुछ कर न सके, कैसी बाधा?
रक्त छलक आया ललाट में,
थी नारी कुल पर नर की चोट।
जब पति ही व्यसनी बन जाए,
क्या इसमें नारी का खोट?
तब मौन सभा में फिर गूंजा,
दुःशासन का अहंकारी स्वर।
समझ मूढ़ नारी तेरे हित,
है कोई भी क्यों नहीं मुखर?
आदेश मान दुर्योधन का,
द्रौपदी उठ, मत बन नादान।
अब उतार ये वस्त्र राजसी,
नियति, यथार्थ को तू पहिचान।
अच्छा हो नारी जीवन में,
बस बनी रहे सुकोमल फूल।
पवन वेग से लड़ती कलियाँ
कि झड़तीं, बन जातीं पद धूल।
नर के बिना यहाँ नारी का,
इस समाज में अस्तित्व कहाँ।
मृदुल कलिका-सी नारी है,
उसका अपना व्यक्तित्व कहाँ।
इसलिए कहूँ मैं पांचाली,
तू देख समय दृग अपने खोल।
नारी नर की छाया भर है,
नारी नर की क्रीड़ा-कल्लोल।
बीच सभा में खड़ा दुःशासन,
था बोल यूं फूहड़ बोल रहा।
उधर हृदय में पांचाली के,
था जैसे लावा खोल रहा।
बड़ी विडम्बना, राजपुत्र ही,
पर नारी पर बल कसता था।
इस कुकर्म को धर्म बताकर,
जो गर्व अनीति पर करता था।
पांचाली की ओर निरंकुश,
दुःशासन बढ़ता जाता था।
रोक रहा न कोई उसको,
यह कैसा दृश्य विधाता था।
यूं लगता था पांचाली को,
जैसे भूमण्डल डोल रहा।
पर हाय शांत बैठे थे सब,
कोई कुछ भी न बोल रहा।
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