राजमहल एक सुन्दर शोभित,
भूतल से छूता था अम्बर।
दीप समान लगी थीं मणियाँ,
जगमग जगमग बाहर भीतर।
महल शिखर पर लगी पताका,
पवन वेग से होती फर-फर।
भीतर फैली चन्दन की गंध,
बाहर रवि किरणों का निर्झर।
द्वार, कपाट, गवाक्ष, झरोखे,
शोभित थे रवि आभा पाकर।
जगमग प्रकाश में चमक रहे,
थे सजे कनक से जड़ित शिखर।
छज्जों से लटके थे सुन्दर;
झूमर, झालर, दीप-आधार।
खम्बों पर चढ़ खेल रहीं थीं,
स्वर्ण लताओं की भरमार।
राजमहल का इंद्रधनुष-सा,
सुन्दर था अति तोरण द्वार।
भित्ति-दृश्य में उद्धृत वैभव,
और विभूतियों की जयकार।
अट्टालिकाओं से घिरा महल,
था गंगा तट से कुछ हटकर।
एक ओर कानन, कल कल जल,
था एक ओर विस्तीर्ण नगर।
दिनमान डूबने चला क्षितिज में,
किया दृश्य सुन्दर साकार।
संध्या आगमन की वेला में,
महल का निखरा और आकार।
अरुण लालिमा छायी नभ में,
ईश्वर की संरचना प्यारी।
एक जीवन का अंत कहो या,
नव जीवन की यह तैयारी।
मंदिर में बज उठी घंटियाँ,
डमरू, मंजीरे और करताल।
शंखनाद संग स्वर गूंजे,
जय महाकाल, जय महाकाल।
गंगा की लहरों से उठती,
कल कल जल की मृदु झंकार।
बहने लगी शांत संध्या में,
प्रभु गीतों की मधुर बयार।
चाँद निकल आया अम्बर में,
दीपों से महल हुआ रोशन।
चंद्र प्रभा में धुला धुला-सा,
खिल उठा नगर मंजुल नूतन।
श्वेत सुधाकर श्याम गगन में,
भू पर बहती मृदुल बयार।
गली, डगर, पथ आलोकित थे,
जैसे सुन्दर दीप - त्यौहार!
नगर कांतिमय शांत चतुर्दिक,
सुन्दर भवनों से घिरा हुआ।
नगर द्वार पर था अति सुन्दर;
वाक्य 'स्वागतम्' लिखा हुआ।
नृप कुरु के कर्मों से सिंचित,
भूमि पुरुषार्थी शूरों की।
हस्तिनापुर राजधानी थी,
रण-पटु बलशाली वीरों की।
महल द्वार पर खड़े हुए थे,
अपराह्न से रथ वीरों के।
लगा निशाने रहे सारथी,
सब अनुमानों के तीरों के।
द्वारपाल तैनात द्वार पर,
अंदर था वीरों का जमघट।
सभा चल रही थी प्रदोष में,
क्या विपदा आकर पड़ी विकट?
तभी अचानक दुर्योधन का,
अट्टहास खुशी से फूट पड़ा।
राजसभा में आज अचानक,
यह किस पर संकट टूट पड़ा?
द्यूत खेल था राजसभा में,
कौरव, पांडव थे प्रतिद्वंदी।
बिन भाला, असि, तीर के कौरव,
सब जीत रहे थे संपत्ति।
नृप बैठे थे सिंघासन पर,
थे कोटि वीर आजू बाजू।
किसे पता दरबार बिकेगा,
काल खड़ा था लिए तराजू।
काल बड़ा बलशाली जग में,
यह नित दिखलाये खेल नया।
कुटिल काल जब चालें चलता,
फिर इसे न आये तनिक दया।
कुटिल चाल के विषफन जब भी,
राजद्वार तक आ जाते हैं।
राजा अगर न मारे उनको,
राजसुतों को खा जाते हैं।
जब जब लख कर अनाचार को,
नृप आँखे बंद कर लेता है।
विनाश बनकर महाकाल तब,
भू शोणित से भर देता है।
गुरु, ज्ञानी, नीतिवानों के,
ज्ञान के सब सागर सूखे।
भरी सभा में नृप के सम्मुख,
अपनों ने ही अपने लूटे।
वहां सभी विद्वान, मनीषी,
ज्ञानी, तेजस्वी गुरुगण थे।
दोनों पालो में बैठे जो,
कुल-भूषण, वीर धुरंधर थे।
बिसात बिछी थी चौसर की,
जमी थी प्रतिद्वंदी टोली।
काल सर्प डस गया, द्यूत में,
जब लगी द्रौपदी की बोली।
बदल गया सब मंजर पल में,
रंग भरी सभा का उतर गया।
दांव द्रौपदी लगी द्यूत में,
सुनकर सन्नाटा बिखर गया।
धर्मराज न समझ सके कि,
यह किसका दांव लगा डाला।
भूल गया वह कुल मर्यादा,
मर्यादा को जिसने पाला।
धर्मनीति पर चलने वाली,
वह सभा बनी एक मौन कुटी।
पूर्ण सभा में एक विरोधी,
भी न कहीं आवाज़ उठी!
धर्माचार्य, विद्वान, नीतिविद,
वे तर्क कोई भी दे न सके।
सब चेहरों से रोष दिखाते,
पर मुख से कुछ भी कह न सके।
चाह कर भी अन्याय रुका न,
अब समय तो पासा फेंक चुका।
भरी सभा में स्वयं राजा भी,
ईमान की पगड़ी बेच चुका।
अब पांचाली की बाजी भी,
धर्मराज युधिष्ठिर हार गए।
एक शोर मच गया सभा में,
वे हार भी अपनी नार गए।
इधर तो पांडव कुल बेचारा,
बस अपना माथा पीट रहा।
और उधर कपटी दुर्योधन,
वह खुश हो होकर चींख रहा।
जीत द्यूत में पांचाली को,
वह मदहोशी में उछल रहा।
कि आग्रह अप्राप्त वस्तु का,
मानो वर्षों में सफल हुआ।
पर उसकी नीयत पल भर भी,
संतोष तनिक न धरती थी।
चाह पांचाली पाने की,
बेचैन उसे अति करती थी।
वह नीच तानकर सीने को,
छलपूर्ण जीत पर फूल रहा।
उस खल की आँखों में केवल,
पांचाली-आनन घूम रहा।
न्याय-धीश सब सहमे बैठे,
नियति की कैसी बेइमानी?
पिछले सभी हिसाब चुकाने,
विकल हुआ निर्लज्ज कामी।
इंगित कर के द्वारपाल को,
तब दंभित दुर्योधन बोला।
जाओ, पांचाली से बोलो-
पहिने वो दासी का चोला।
धारण कर दासी का चोला,
वह शीघ्र सभा में आ जाये।
हर्ष, विजय की इस वेला में,
वह विजय गीत मेरे गाये।
कहना कि युधिष्ठिर हार गए,
उनसे दुर्योधन जीत गया।
कोई नही अब तेरा जग में,
कि हार तेरा हर मीत गया।
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