Sunday, September 12, 2021

मुक्तक

 

नारी एक सुन्दर सदग्रन्थ,
क्यों हाय! पुरुष ने न बाँचा
नारी है गरिमा सृष्टि की,
नारी है संस्कृति का साँचा

नारी मृदु भावों का संगम,
नारी को हाय अबल जाँचा!
नारी वसुधा - अमृत - सरिता,
नारी जननी, जीवन-साँचा।

नर नारी हैं निशा दिवा से,
पूर्ण नहीं, पूरक होते हैं
नर नारी ही दोनों मिलकर,
इस अपूर्णता को खोते हैं


नर का जीवन यदि कानन है,
नारी जीवन सुरभित उपवन
नर है कठोर, कर्मठ जग में,
नारी करती जीवंत सदन।

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