राजभवन में उधर द्रौपदी,
द्यूत क्रीड़ा से थी अनजान।
सजा रही थी वह केशों को,
बन कर एक दर्पण की शान।
नयनों में काजल भर उसने,
था किया घटाओं को फीका।
और तेजस्वी ललाट पर अपने,
खींचा एक कुमकुम का टीका।
फिर देख नयन मृग से अपने,
हर्षित हो अधरों को भींचा।
निरख निरख अपने यौवन को,
आनंदित नयनों को मींचा।
मंद-मंद स्मित से उसके,
मृदु गालों में खिल उठे भंवर।
हो लालायित लटक रही लट,
छूने को कोमल लाल अधर।
ज्वाला-सी सुशोभित थी उसके,
केशों में सीमन्त-लाल-रेख।
अभिमान शिखर पर था उसका,
कांतिमय मुख और भाल देख।
आनन बिजली सा चमक रहा,
श्रृंगार की आभा को पाकर।
लगता था जैसे बैठी हो,
सुंदरता की देवी आकर।
दो कमल कली सी थी आँखे,
भ्रूं थीं काले सृप के फन-सी।
वे धरा गगन सी लगती थीं,
उठती गिरती पलकें उसकी।
नैन नक्श तीखे कटार से,
था सुन्दर कोमल निर्मल तन।
अग्निकुंड से वह जन्मी थी,
था अंग-अंग कुंदन-कुंदन।
सर्वश्रेष्ट धन्वी की संगिनी,
वो पांडव कुल की आन थी।
था द्रुपद पिता द्रौपदी का,
वो उत्तुंग-शिखर-अभिमान थी।
अनभिज्ञ काल की घातों से,
वह उस संध्या समय विशेष।
पूजन की तैयारी में थी,
पूजा में था कुछ समय शेष।
प्रदोष काल की कुलीन सेज,
ले आयी संग मलिन सन्देश।
क्या पता काल का क्रूर वार,
कर दे किसको कब निःशेष!
दरवाजे पर दस्तक देकर,
पांचाली को किया प्रणाम।
कैसे कहे जो कहने आया,
खड़ा असमंजस में दरबान।
सकुचाया! दरवान कि कैसे,
वह आँखों देखा हाल कहूँ।
चाल चली जो दुर्योधन ने,
मैं कैसे उसकी चाल कहूँ।
बोली पांचाली- नर बोलो,
तुम क्या संदेशा लाये हो?
निःसंकोच बताओ सब कुछ,
तुम इतना क्यों सकुचाये हो?
हे रानी, मैं कैसे बोलूं?
हैं घटना क्रम ही कुछ ऐसे।
आज हुआ है जो महलों में,
वह तुम्हे बताऊँ मैं कैसे?
आया हूँ मैं तुम्हे सुनाने,
दुर्योधन का एक आदेश।
आना होगा राजसभा में,
यही नियति का है सन्देश।
रानी सुनो, आज महलों में,
एक द्यूत-युद्ध हुआ भारी।
हार गए महाराज युधिष्ठिर,
अपनी हर एक बाजी हारी।
फिर दांव लगाया स्वयं का ही,
भ्राता संग, लेकिन हार गए।
जाने क्या हुआ उन्हें रानी,
कि खाली सारे वार गए।
दांव लगाया था फिर जिसका,
क्या कहूँ, लाज बस आती है।
हे रानी! बतलाऊँ कैसे?
ये छाती फटी सी जाती है।
पांचाली रानी का अंतिम,
हा! राजा दांव लगा बैठे।
था दैव! आज क्या भाग्य में,
वह यह भी दांव गंवा बैठे।
सुनकर अपना नाम द्यूत में,
रानी पांचाली सिहर उठी।
नजर अँधेरा ही बस आया,
जिस ओर जिधर भी नज़र उठी।
पांचाली के आकुल मन में,
घनघोर वेदना उमड़ पड़ी।
सुनकर हाल द्यूत-क्रीड़ा का,
वह निश्चल-सी रह गयी खड़ी।
हो विस्मित पांचाली बोली,
क्या दाँब लगा दी पांचाली?
क्या अभद्र बात तुम करते हो!
बोली आँखों में भर लाली।
धर्मराज हैं धर्म मूर्ती,
बतला रहे तुम कैसा हाल?
हे नर! तुम सब सच सच बोलो,
छल, कपट, दुर्योधन की चाल?
अब पांचाली के नयनों में,
बिजली-सा क्रोध कौंध आया।
बड़ी वेदना, भारी मन से,
तब द्वारपाल ने बतलाया।
खेल द्यूत का खेल रहे थे,
फिर पड़ा खेल कर पछताना।
इधर सभी पांडव थे रानी!
कौरव कुल उधर सभी स्याना।
धर्मराज पांडव दल से थे,
कौरव दल से शकुनि मामा।
पासे फेंक रहा था शकुनि,
कटु चालें बदल बदल नाना।
कुटिल दांव शकुनि के रानी,
उस खेल में बाजी मार गए।
पासे की चालों में पांडव,
सब राज खजाना हार गए।
‘सब हार गया हूँ’ यह
कहकर,
जब धर्मराज उठ खड़े हुए।
शकुनि बोला, हे ज्येष्ठ श्रेष्ठ,
हैं शेष ताज सर चढ़े हुए।
पासे फेंके फिर शकुनि ने,
वह ताज भी सारे जीत गया।
सबने समझा अब तो सारा,
ही खेल द्यूत का बीत गया।
लेकिन हे रानी शकुनि ने,
था एक षड़यंत्र रचा भारी।
उसने उन पासों में जाने,
क्या कर रखी थी तैयारी!
उसने अपने लंग पाँव पर,
मुश्किल से ही खुद को तोला।
सहसा शकुनि बड़े जोश से,
तब आसन से उठकर बोला-
हे धर्मराज! क्यों तुम अपना,
इतना कम मूल्य आंकते हो?
खेलो लगा स्वयं की बाजी,
क्यों रण छोड़कर भागते हो?
सुनकर शकुनि के कूट वचन,
हो धर्मराज लाचार गए।
पहले तो वह स्वयं को हारे,
फिर अनुजों को भी हार गए।
हार गए जब धर्मराज तो,
शठ शकुनि हर्षित हुआ विशेष।
कपटी बोला धर्मराज से,
अभी तो है पांचाली शेष।
हे रानी! कथनी सच है कि,
ये नाश काल जब आता है।
शिक्षक, विद्वान, मनीषी हो,
वह मूढ़ मति बन जाता है।
हाँ, धर्मराज अति व्याकुल थे,
फिर हासिल कैसे यहाँ करें।
आतुर हो दाँब लगा बैठे,
वे वहाँ आपका, क्षमा करें।
हे रानी! आज्ञा दो, बोलूं
है नहीं ठीक मेरा कहना।
लगता पासे मान रहे थे,
केवल शकुनि का ही कहना।
शकुनि के पासो में क्या था,
कि एक न खाली वार गया!
पासे जब फेंके शकुनि ने,
पांडव कुल फिर से हार गया।
हार गए जब पांडव रानी,
थे बजा रहे कौरव ताली।
कहूँ नियति या नर-लाचारी?
विस्मित हूँ रानी पांचाली!
विस्मित-दृग, अवाक द्रौपदी,
थी सम्मुख दर्पण खड़ी हुयी।
दर्पण पार कुपित नयनों की,
अक्षि नयनों पर गड़ी हुयी।
आँखों में ज्वार, उठता विचार,
करता उसका अन्तः प्रहार।
पर नियति के इस कटु सत्य को,
कह मिथ्या, कैसे दे नकार?
सुनकर ये वर्णन पांचाली,
रह गयी छली-सी खड़ी हुई।
उसके थे प्रश्न कई मन में,
वह गहन सोच में पड़ी हुई।
लगा स्वयं की बाजी खेलें,
तो खेलें वो, इंकार नही।
वो दांव लगाएं नारी का,
किंचित उनको अधिकार नही।
जो दाँब लगा दे नारी का,
नर नही क्या वह तुच्छ अति दीन?
मन से मलीन, कर्म से विहीन,
स्वाभिमान है उसका क्षीण।
नारी का श्रृंगार मान है,
और मान बिना पहिचान नही।
नारी वो मृत, बेजान यहाँ,
जिस नारी का सम्मान नही।
जो दांव लगाए संगिनी का,
यूं हया उतर जाए सर से।
उस न्याय-सभा में पांचाली,
क्या मांगे स्वयं बिके नर से?
पांचाली का प्रश्न स्वयं से,
संबंध क्या नर का नारी से?
यदि हृदय में प्रेम नही है,
क्या बंधन पति का प्यारी से?
प्रेम से बंधते नर नारी,
प्रेम से ही ये मनुजता है।
अन्यथा, नर नारी को क्या,
वस्तु-सा बेच भी सकता है?
समझा था मैंने प्रेम जिसे,
क्या नर भी उसे समझता है?
मन का विकार है प्रेम यहाँ,
या स्वार्थ ही नर में बसता है?
पांचाली बोली सेवक से,
हे सेवक बापस तुम जाओ।
है एक प्रश्न मेरा उनसे,
तुम उसे पूछ कर फिर आओ।
जब सब कुछ जीत लिया उनसे,
उनका दुर्योधन निष्ठुर ने।
फिर दांव लगाया था किसका,
पहले महाराज युधिष्ठिर ने?
जिस दम पासे खेल रहे थे,
वे लगा दांव न्यारे न्यारे।
पांचाली दांव लगी पहले,
या, पहले स्वयं को वे हारे?
यदि हार स्वयं को पहले ही,
उन ने दासत्व स्वीकार किया।
पांचाली दांव लगाने का,
किसने उनको अधिकार दिया?
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