सभा में अपमानित होकर,
पांचाली भू पर पड़ी हुयी।
इस घोर विपद में अब उसकी,
एक शुरू परीक्षा कड़ी हुयी।
उस अति भीषण कटु क्षण में भी,
पांचाली हुई ध्यानस्थ जरा।
भगवान कृष्ण को याद किया,
वाणी थी उसकी मुखरपरा।
कर रही अर्चना पांचाली,
करने हेतु बाधा निर्बाध।
हे चक्र सुदर्शन धारी श्याम,
भर दो उर में शक्ति अगाध।
हे कमलनयन कैसे रोकूं?
तत्पर बहने को नयन-नीर।
कुल, समाज कुछ काम न आये,
हे प्रभु! हरो तुम मेरी पीर।
अपने आंसू कैसे रोकूं?
फटती है पीड़ा से छाती।
क्या नहीं एक भी अश्रु मेरा,
अबल करेगा नारी जाति?
हे गिरधारी! कब तक रोकें,
मेरे दृग कपाट अश्रु निर्झर?
लाज बचाना आज सभा में,
है कान्हा तुम पर ही निर्भर!
अपनों के बीच खड़ी हूँ मैं,
न कोई मुझे बचाता है।
दुनिया में प्रभु बिन कोई नही,
यह आज समझ में आता है।
इस सभा में मेरा कोई नहीं,
मैं खड़ी मौत से खेल रही।
हे नाथ देख लो स्वयं आकर,
मैं कैसी विपदा झेल रही।
हो रही धर्म की अति ग्लानि,
हे दुःख भंजक! हे ब्रजनंदन!
धर्म उत्थान के लिए पधारो,
अलौकिक-विराट-रूप भगवन!
हृदय में ज्योतियों के पुँज खोलो,
पड़े जो बंद पट और कुँज खोलो,
कि तम घनघोर भू पर छा रहा है,
विकर्तन उगने से घबरा रहा है।
कुचालें सूर्यवंशी चल रहे हैं,
सभी ये हाय मुझको छल रहे हैं,
हुआ है आज क्या सबकी हया को,
खड़ी है एक नारी यूं दया को।
मति विकृत मनुज की हो चुकी है,
मनों में बीज विष के बो चुकी है,
अनय का खेल ही सारा यहाँ है?
या, नर को स्वार्थ ही प्यारा यहाँ है?
यहाँ नर श्रेष्ठ जा किस पथ रहे
हैं,
कहाँ अमृत? सभी विष मथ रहे हैं,
विधि का भय सभा ये खो चुकी है,
विभा-रश्मि निशा की हो चुकी है।
लगे है आँख में कुछ कुल रहा है,
दिशाओं में सघन तम घुल रहा है,
यह है नाश या नवयुग-सवेरा,
करेगा क्या नरक भू पर वसेरा?
मृषा के हाथ सत्य की कलम है,
सभा में हो रहा कैसा दमन है,
मनुजता आज गरिमा खो चुकी है,
अनय की पार सीमा हो चुकी है।
मरण संवेदना का हो चला है,
दया दिल से मनुज ये खो चला है,
पतन के गर्त में वह गिर रहा है,
नहीं अब उसके सिर पर सिर रहा है।
विधाता हे मुझे ब्रह्मांश कर दे,
नसों में ब्रह्म-बल उद्दाम भर दे,
करूं तांडव मुझे वह शक्ति दे तू
मिटे जिससे दुःशासन, युक्ति दे तू।
मेरे इस कंठ को पाञ्चजन्य कर दे,
समर में दुष्ट को निर्बल्य कर दे,
बनूँ चण्डी मैं सिंहनी सी दहाड़ूँ,
जो आये सामने रण में, पछाड़ूँ।
शिला-सा प्राण में काँटा फंसा
है,
समर्थन पाप को दे जो हंसा है,
उसे तुम मृत्यु का उपहार दो हे!
उसे काली पदों में धार दो हे!
फलित हों आज संचित पुण्य सारे,
अनुष्ठानों के फल जो भी हमारे,
विधाता हे, मेरा आदेश पाकर,
चले होनी मेरे हित सिर झुकाकर।
अगन जितनी मेरे उर में अभी है,
धरा में आग जितनी भी दबी है,
फटे, निकले सभी अंगार बन कर,
बहे भू पर प्रलय की धार बन कर।
हृदय से एक दुर्गम आग फूटे,
महा प्रलय अरि पर आज टूटे,
अरि को मुष्टि एक विकराल कूटे,
सुदर्शन-धार अब अक्षि से छूटे।
मुझे आशीष के अंबार दो हे!
कपाली काली सा श्रृंगार दो हे!
अनल दो, आग दो, अंगार दो हे!
इसी काया में तुम अवतार दो हे!
सजा दे इन दृगों में तू अंगारे,
कहीं से तू अनल ऐसी मंगा रे,
जलाकर जो अरि को राख कर दे,
जले धू धू अरि को लाख कर दे।
प्रलय की देवियों तुमको नमन है,
तुम्हारे हाथ में किसका कफ़न है,
इसे जल्दी दुःशासन को उढ़ाओ,
बढ़ाओ तुम उधर ये पग बढ़ाओ।
वरद मैं नाथ तुमसे मांगती हूँ,
तुम्हारी ओर दृष्टि टांगती हूँ,
प्रलय की आग में अरि को धकेलूं,
समर में भैरवी-सी आज खेलूं।
सभी संचित मेरे सत्कर्म आओ,
भरो बाहों में तुम मुझको उठाओ,
उठो पुण्यों, दिवाकर-सा जलो तुम,
शिलाओं तप की मेरी सब गलो तुम।
कठिन व्रत और मेरी साधनाओं,
सभी देने मुझे वरदान आओ,
करूं क्या सत की माताओं बताओ,
उठो ओ दूतियों तुम वज्र लाओ।
मुझे माँ शक्ति की झंकार दे दो,
चमकते तेज के अंगार दे दो,
छुए बिन दुष्ट को मैं भस्म कर दूँ,
अरि की आखिरी मैं रस्म कर दूँ।

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