निशा की घोर में जलधि पटल से,
किसी सुर-झील में जैसे कमल से,
अहो! क्या सुर्ख भानु उग रहा है,
मराला लाल मोती चुग रहा है।
सभी के हाय लोचन तो खुले हैं,
सचाई ये कि सोने पर तुले हैं,
विकर्तन न किसी को दिख रहा है,
विधाता भाग्य में क्या लिख रहा है!
गगन में भोर होने जा रही है,
रवि आभा पटल पर छा रही है,
चहकते हैं पखेरू, खग ये अनगिन,
गहन सोया हुआ कुरु-कुल है लेकिन।
मनुज ये स्वार्थ में अब लिप्त होकर,
अहम् में सो रहा
सद्बुद्धि खोकर,
जगाना चाहें भी, कैसे जगाएं?
अतल तक गिर चुके, कैसे उठाएं?
अलौकिक देखकर भी नर अहम में,
यहाँ फिर डूब जाता
घोर तम में,
नहीं सूरज उसे दिखलाई देता,
दिवा को भी निशा वह मान लेता।
खिला फूलों को निर्जन में विधाता,
बिना माली ही वो उपवन सजाता,
मनुज को रंक से राजा बनाता,
वही नर को उठाता और गिराता।
मनुज बैठा नशा माथे चढ़ा कर,
सहारा कोई क्या दे कर बढ़ा कर?
मनों में द्वेष घातक पल रहा है,
मुकुट हेतु सगों को छल रहा है।
मनुज की बुद्धि मद में चूर होकर,
प्रतिष्ठा और कुल से दूर होकर,
स्वयं दुर्भाग्य लिखने पर तुली है,
मिलन को काल से हर बांह खुली है।
कहाँ तक सत्य नर झुटला सकेगा?
अगर बोयेगा कांटे, क्या चुनेगा?
समझ में दम्भी की पर आये कैसे?
लगें दुष्कर्म भी सत्कर्म जैसे।
सुराही दर्प-मय की खोलकर जो,
गरल उसमें विषय का घोलकर जो,
चुका यदि पी, कठिन उपचार उसका,
कहाँ भरमायेगा अनुनय किसी का!
अनय से पूर्ण ग्रीवा को उठाकर,
भुजों से राजदंड को भी झुकाकर,
चलेगा नर, कहाँ तक चल सकेगा?
विधाता पथ में न ठोकर धरेगा?
महासंग्राम होगा एक भारी?
इन्हे क्या शाप देगी एक नारी?
ये कौरव दल रसातल जायेगा अब?
इन्हे रण काल बनकर खायेगा अब?
धरा क्या हाय शोणित से भरेगी?
महासंग्राम में सेना मरेगी?
दिशा अब खून से हर लाल होगी?
नियति अब इन सभी की काल होगी?
कि समझाने अगर आयें हरि भी,
कहा मानेगा दुर्योधन कभी भी?
बड़ा क्रोधी, अहंकारी, अधम है,
कि उसका स्वार्थमय ही हर कदम है।
हलाहल-सी अगन हो शांत कैसे?
लगे ज्वालामुखी हो एक जैसे,
दहकते कोयलों सा जल रहा है,
विषय सुख में स्वयं को छल रहा है।
महा-विध्वंस होगा क्या यहाँ पर?
रुकेगा नर स्व-शाला ही जला कर?
बचाओ हस्तिनापुर जल रहा है,
अभी जिसका सुनहरा कल रहा है।
सभा में वीर सारे मौन क्यों हैं?
यहाँ बैठे हुए सब कौन? क्यों है?
यहाँ अन्याय कैसा चल रहा है?
विधाता! गर्भ में क्या पल रहा है?
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