अधरों पर हास गरल लाकर,
मद में डूबा दुष्ट दुःशासन।
घूम घूम कर पांचाली के,
करता तन का अवलोकन।
गरजा मद में पुनः दुःशासन,
पापी! धर्म की लेकर आड़।
फिर करने को पाप बढ़ा खल,
वह पापों का उत्तुंग पहाड़।
राज सभा में पड़ी द्रौपदी,
भर रही प्रलय-सी हुंकार।
उठ ललाट का रक्त पौंछती,
जल रहे आँखों में अंगार।
हो चकित उसे सब देख रहे,
वह उठी कि या तूफ़ान उठा।
वह तेज पुंज सी चमक रही,
विद्युत की तेग हो या सविता।
जिसको कहते हैं महा-नाश,
या प्रचंड प्रलय-अनुमान।
भूकंप, चक्रवात, हिम-वर्षण,
सभी लगते उसके प्रतिमान।
चलती थी स्वासों में झंझा,
विकल, लाने को महा उजाड़।
फिर पांचाली स्वर गूँज उठा,
जैसे कि सिंहनी रही दहाड़।
उर में आ लगते थे सीधे,
उसकी वाणी के अदृश्य तीर।
हिल उठी महल की दीवारें,
सुन द्रौपदी-गर्जन गंभीर।
असमर्थ, विवश, आहत भू पर,
कुछ क्षणों पूर्व
जो गिरी पड़ी।
काल रूप बन, कुपित भवानी,
वह दुर्गा सी अब अचल खड़ी।
केशों में
ताण्डव-बिखराव लिए,
दिनमान सा दीपित भाल लिए,
नयनों में चपला जाल लिए,
वह खड़ी रूप विकराल लिए।
हर नर विस्मित था उसे देख,
विश्वास न होता आँखों पर!
नारी के इस कोमल तन की,
शक्ति है भारी लाखों पर।
वह शत्रु खून की थी प्यासी,
यह चमत्कार प्रभु की माया।
निश्चित ये वह नहीं द्रौपदी,
जिसकी थी कोमल मृदु काया।
दुर्गा, चामुंडा, काली सी,
थी खड़ी हुई निर्भीक निडर।
रण चंडी वह, मन भय खाता,
जो देखे कोई लोचन भर।
लगता था कि आज द्रौपदी,
ब्रह्माण्ड में अग्नि भर देगी।
छुए कि पहले ही भस्म दुःशा-
सन को अग्नि से कर देगी।
मानो था चक्र सुदर्शन ही,
उसकी अंगुली पर घूम रहा।
था महाकाल का ही जैसे,
क्रोधानल नभ को चूम रहा।
न दुष्ट दुःशासन देख सका,
पांचाली का दिव्य स्वरुप।
अपनी धुन में वस्त्र हरण को,
बढ़ा, मानकर स्वयं को भूप।
चपला-सी कौंध गयी तन
में,
ज्यों ही छुआ साड़ी का छोर।
श्याम घनों की बिजली सारी,
मानो आ गई उसकी ओर।
दूर छिटक जा गिरा दुःशासन,
झंझा में पर्ण उड़े जैसे।
अहम् ग्रसित आँखों में उसकी,
दृश्य यथार्थ चढ़े कैसे?
सबने देखा पड़ा दुःशासन,
अपमानित, भू को चूम रहा।
नहीं दिखाई दिया किसी को,
जो चक्र सुदर्शन घूम रहा।
अहम् बड़ा बलशाली होता,
मन को ऐसे कस लेता है।
जैसे कोई नाग लिपट कर,
किसी मनुज को डस लेता है।
अपमानित सा गिरा पड़ा था,
अवनि पर जब स्वयं दुःशासन।
भू लुंठित हो भरी सभा में,
कुंठित हुआ बड़ा मन ही मन।
देख रहा वह सब कुछ लेकिन,
कहाँ मूल तत्व पहिचान रहा?
मृग तृष्णा में फंसा दुःशासन,
लपटों को शीतल मान रहा।
हुआ अभी जो, मान असंभव!
भर उठा दुष्ट में भीषण क्रोध।
अभी द्रौपदी की शक्ति का,
न हो पाया था उसको बोध।
भरी सभा के बीच दुःशासन,
सहे कैसे अपना अपमान?
वार एक नारी का नर पर,
रौंद रहा उसका अभिमान।
अबला है पर मायावी है,
इस से ये नर पर भारी है।
गुर्राकर बोला दुर्योधन-
मत समझ कि ये बेचारी है।
कुपित दुःशासन बोला, देखूं!
इसकी कितनी तैयारी है?
अकड़ देख लगता है इसकी,
जिद कुछ ज्यादा ही भारी है।
सुन घोर गर्जना मेघों की,
क्या कहीं गिरि हिल जाता है?
झंझा के प्रबल वारों से,
पर्वत छलनी हो पाता है?
कांटो के लगने से माली,
कब पुष्प छूने से डरता है?
देख द्रौपदी तुझे दुःशासन,
वस्त्र-विहीन अभी करता है।
आ दुष्ट दुःशासन! छू मुझको,
देखूं शक्ति मैं नर की आज।
खुली चुनौती तुझको मेरी,
देखले यह भी सकल समाज।
गिरती जब घृतधारा कुंड में,
आता अग्नि में प्रचंड उभार।
क्रोध ताप से तपी द्रौपदी,
रही दुःशासन को ललकार।
तू ही क्या? कोई भी कौरव,
करेगा क्या मेरा अपमान?
धर्म - सत्य - संरक्षण मुझको,
मत भूल सत्य ही है बलवान।
खुले केश उसके लगते थे,
विषैले फन फैलाए नाग।
देख रोष उसका लगता था,
हो प्रज्ज्वलित प्रचण्ड आग।
सीना था उसका तना हुआ,
भरा अंदर भीषण गुब्बार।
नयनों ऊपर चलती भोंहे,
रहीं सर्पिणियों सी फुंकार।
जल रहा श्वास में तेज अनल,
था उर में ज्वालामुखी विकट।
मन में उठते सिंधु ज्वार का,
कर रहे नयन प्रमाण प्रकट।
खड़ा दुःशासन देख रहा था,
पांचाली का अद्भुत रूप।
चाहकर भी न बढ़ पाता था,
ज्यों आगे एक खुदा हो कूप।
आँखों से उसकी सूचित था,
वह झौंक रहा था सारा बल।
पर कदम नहीं हिल पाते थे,
पाकर भी स्व-दल से संबल।
वह करता रहा प्रयत्न अथक,
फिर भी सब कुछ ही रहा व्यर्थ।
था शक्ति हीन उसका शरीर,
किन्तु न समझा इसका अर्थ।
एक कदम न चल पाता था,
बेवश खड़ा दुःशासन नीच।
दीवार अदृश्य खड़ी जैसे,
उसके और द्रौपदी बीच।
क्षीण हो गया काया का बल,
मुख उसका तेज विहीन हुआ।
एक नारी के सम्मुख क्षण में,
उसका पौरुष बल क्षीण हुआ।
क्यों न खींचता अरे दुःशासन!
बढ़कर पांचाली का चीर?
हे वीर अनुज क्या हुआ तुम्हे?
दुर्योधन चींखा हो अधीर।
‘हार चुका हूँ’ भरी सभा में,
दुःशासन कैसे कहे, हे राम!
उसकी आँखें बोल रहीं थी,
हो चुके अंग अंग बेकाम।
देख दुःशासन को निर्बल-सा,
कहे दुर्योधन भर हुंकार।
अरे दुःशासन एक नारी से,
क्या कभी हुयी पुरुष की हार?
था तो दुर्योधन भी विस्मित,
देख दुःशासन की यूं हार।
पर अहम् कहाँ करने देता,
हार सरलता से स्वीकार?
चीख उठा द्रौपदी पर वह,
बहुत हुआ मायावी काज।
और दिखा तू मैं भी देखूं,
शक्ति तेरे इस छल की आज।
बड़ी विडम्बना छलिया कहता,
नैतिकता की शक्ति को छल।
हाय मनुज क्यों नहीं समझता,
नियति देती कर्मों का फल।
जैसी करनी बैसी भरनी,
जो, जो करता, भर लेता है।
अधिकार कर्म पर है केवल,
ईश्वर उसका फल देता।
सिद्धांत कर्मफल ईश्वर का,
है अटल, भूल नर जाता है।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में,
ये प्राणी फंसता जाता है।
दुर्योधन मन में सोच रहा,
क्षय कैसे हुआ दुःशासन बल?
फिर भी बोला पांचाली से,
ले ह्रदय में अपमान अनल।
जितना रमणी अबला समझा,
वैसी नही है तेरी देह।
अरी द्रौपदी, नहीं जरुरी,
लायें बादल हर बार मेह।
बलहीन दुःशासन मिट्टी की,
जब मूरत सा रह गया खड़ा।
पांचाली का वस्त्र खींचने,
तब दुर्योधन उस ओर बढ़ा।
पांचाली ने हुंकार भरी-
हाँ, हाँ दुर्योधन! तू भी आ।
मेरे उर अंतर की लपटें,
आतुर करने को तेरा दाह।
ओ कपटी निर्लज्ज दुर्योधन,
जरा खोल आँखें और देख।
हाल अनुज का तेरे, जैसे
हवा में ओछा तिनका एक?
है तुझे चुनौती छू मुझको,
कि देखूं तेरी भी औकात।
परछाई तक छू नहीं सकता,
फिर क्या छुएगा मेरा गात?
वह अग्नि शिखा सी खड़ी हुई,
निर्भीक सभा में रही बोल।
एक नारी नर-अहम्-शैल को,
रही प्याज-परतों-सा खोल।
सुनकर ये स्वर पांचाली के,
फिर क्रोध से दुर्योधन खोला।
पर देख दुःशासन की हालत,
वह डरा, मगर फिर भी बोला।
क्या तूने समझा जीत गयी,
चला कर तू मायावी तीर?
मैं भी देखूं मेरे होते,
न खिंच पायेगा कैसे चीर?
‘रुक जा तू’ कह चक्रवात-सी,
वह दुर्योधन की ओर बढ़ी।
लगा देख कि खांडा लेकर,
स्वयं काली आ हुई खड़ी।
हे खल दुर्योधन! पता न था,
दरबार आज बहरा होगा।
तलवार उठा सम्मुख मेरे,
प्रतिशोध यहीं पूरा होगा।
ये गूंगी बधिर सभा देखे,
नर पर एक नारी का वार।
कुरु सभ्यता औ' संस्कृति का,
मैं देख चुकी जर्जर आधार।
नर संरक्षण में नारी की,
कोमलता अच्छी लगती है।
हो जाये नर ही पतित यदि,
वह विवश हो दुर्गा बनती है।
सुन खलनायक दुर्योधन! मैं,
अपमान अनल में जलती हूँ।
दुःशासन लहू से धोऊँगी
ये केश, प्रतिज्ञा करती हूँ।
जिसके कलुषित हाथों ने छू,
ये मेरे केश किये दूषित।
उसका मृत्यु ही मात्र दंड,
दुर्योधन! करती हूँ घोषित।
यूं मुष्टि पटक भू पर उसने,
ली सौगंध भर कर आवेश।
न दुःशासन लहू से धो लूँ,
बिखरे रहेंगे मेरे केश।
सुनकर पांचाली-प्रतिज्ञा,
थे लगे गूंजने अगणित स्वर।
दुःशासन - दुर्योधन - निंदा,
कर रहे अनेकों वीर प्रवर।
अनायास ही कई सभासद,
पांचाली हित में हुए मुखर।
क्या दोष द्रौपदी का इसमें,
दे रहे तर्क आगे आकर।
जीवन में ऐसे क्षण आते,
झूठे कहलाते सत्यवान।
बने न्याय अभिलाषी बल का,
बड़ी विडम्बना, हे भगवान!
यह सच है की यहाँ देर से,
ही विजय सत्य को मिलती है।
झूठ, लाख तुम उसे छुपाओ,
पर पोल एक दिन खुलती है।
अन्याय, अनीति से जग में,
बस क्षणिक सफलता मिलती है।
जो नीति पर चलते उनकी,
किस्मत की कलिका खिलती है।
है झूठ नाव एक कागज़ की,
थोड़ा सा चलकर गलती है।
पर आंधी, तूफानों में भी,
बस नाव सत्य की चलती है।
नृप धृतराष्ट्र चुप बैठा था,
हो सुत मोह में अंधा आज।
बिच्छू-सा डंक मार रही थी,
न्याय पक्ष की हर आवाज।
विकल हो उठा देख पुत्र की,
यूं द्रौपदी के हाथों हार।
चक्षुहीन होकर भी जैसे,
वह देख रहा था आर पार।
न चाहता था हार मान ले,
बताकर इसे पुत्र की भूल।
किन्तु यह भी न चाहता था,
कि आये सुत के पथ में शूल।
राजनीति में वही निपुण है,
जो हवा का रुख पढ़ लेता है।
कद ऊंचा करने को अपना,
जो कभी कभी झुक लेता है।
रिपु दल से भी काम बने तो,
अपनी मैत्री गढ़ लेता है।
तय करने को लम्बी दूरी,
जो थोड़ा सा रुक लेता है।
भांप समय को धृतराष्ट्र तब,
उठकर बोला सिंघासन से।
शांत द्रौपदी! हुई है गलती,
यह निश्चित ही दुर्योधन से।
तब राजा ने आदेश दिया,
करो दुर्योधन! प्रायश्चित आज।
मुक्त हों पांडव ससम्मान,
और दो उनको उनका राज।
द्रौपदी, क्षमा मांगता हूँ,
अन्याय तुम्हारे साथ हुआ।
हे युधिष्ठिर तुम हो कुलभूषण,
न कभी अधर्म ने तुम्हे छुआ।
यहाँ सत्य की शक्ति हो जिसमे,
युधिष्ठिर! उसको कैसा भय?
द्रौपदी और अनुज लेकर,
तुम करो राज होकर निर्भय।
हे युधिष्ठिर! गृह प्रस्थान करो,
भूल अनीति, अधर्म, अन्याय।
है धन्य धन्य वह नर जग में,
हो जीवन जिसका धर्म हिताय।
बीच सभा में खड़ी द्रौपदी,
शांत भले ही लगती थी।
प्रतिशोध अनय का लेने को,
सीने में आग धधकती थी।
जब जब अनीतियों के सम्मुख,
यह राजदंड झुक जाता है।
त्राहि त्राहि मच जाती है,
ये जग सारा दुःख पाता है।
जब जब स्वर्ग सी वसुधा पर,
अति पाप, अधर्म बढ़ जाता है।
विविध रूप में स्वयं नियंता,
तब रक्षा हेतु आता है।
चल पड़ी द्रौपदी महलों को,
संग में लेकर पांचो योगी।
उठता था ज्वार यही मन में,
कि पूर्ण प्रतिज्ञा कब होगी?
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