Sunday, September 12, 2021

समर्पण

 

जिनसे पाकर जीवन मैंने, अब तक देखे कई वसंत।
समर्पित उनको यह काव्य-फल, करता हूँ प्रणाम अनंत।।

फिर जीवन के एक वसंत में, हे साथी! जब तुम आये।
कर पूर्ण मुझे, जीवन जीने के अर्थ नए तुमने सिखलाये।।

नीर, ये काव्य-धन संग तुम ही लाये मैं ऐसा जानता हूँ।
मुस्कान तुम्हारी सुख-वृष्टि, तुम्हे अपना भाग्य मानता हूँ।।

भूमिका

 

     प्रत्यक्ष है कि भूमिका प्रायः किसी भी पुस्तक लेखन का अंतिम चरण है। आज स्वतंत्रता दिवस का पावन पर्व भी है और यह काव्य पुस्तक भी लगभग मेरी लेखनी से स्वतंत्र होने वाली है। वैसे तो द्रौपदी चीरहरण की घटना से जन जन परिचित है, फिर भी मेरा उत्तरदायित्व है कि मैं भूमिका के माध्यम से वह सब संक्षिप्त में बताऊँ जिसे शायद हर पाठक जिज्ञासावश जानना चाहता है। वह जिज्ञासा है पूर्वाभास, कारण या प्रेरणा जो किसी भी लेखक के कान में कहती है- लिखो।

बात यह तब की है जब मैं IIT में पढ़ रहा था और मैंने द्रौपदी चीरहरण पर कुछ लिखना चाहा। यह वही समय था जब निर्भया जैसे निर्मम अपराधों के प्रति जनता में क्रोध था, रोष था। एक दो कविताएं मैनें भी लिखी फेसबुक पर सांझा करने के उद्देश्य से। और उसी श्रृंखला में द्रौपदी पर दो चार छंद लिखे और छोड़ दिये। लेकिन यह मेरे मस्तिष्क में हमेशा रहा कि वह कविता पूर्ण करनी है लेकिन कब? इसका मुझे भी कुछ पता न था। यह मेरी कल्पना के परे था कि उस समय लिखे कुछ अधूरे छंद इस खंडकाव्य की नींव बन जाएंगे। शायद मैंने तो उसको केवल फेसबुक के लिए ही लिखना शुरू किया था। यह एक पुस्तक रूप में मेरे सामने आएगी, यह अकल्पनीय था और इसे मैं उस शून्य रूप की कृपा मानता हूँ जो शब्दों को काव्य की माला में गुंथवाती है।

इसको लिखते समय कबीर दास जी का एक दोहा सतत मेरे चित में रहा-

मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ।

चारों जुग कै महातम कबीरा मुखहिं जनाई बात।।

क्योंकि आज के समय में इस दोहे की प्रथम पंक्ति को चरितार्थ करना बड़ा सरल है। और इस पुस्तक के लेखन में यह पंक्ति सटीक बैठती है क्योंकि यह पुस्तक लैपटॉप और मोबाइल पर ही लिखी गयी।

मुझे लगता है की यह काव्य रुपी माला तरह तरह के फूलों से गूँथी हुई है। अगर सामन्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाए तो हो सकता है कि यह माला बड़ी ही अजीब मालूम पड़े क्योंकि इसमें कहीं बड़ा फूल है तो कहीं छोटा। कही लाल है तो कहीं सफ़ेद। ये तो कुछ खिचड़ी सी ही नज़र आती है। परन्तु, मैं आपसे वादा करता हूँ कि इसकी खुशबू ताजे फूलों की ही है। इसी श्रृंखला में मैं अपने पिताजी का कोटि कोटि आभार प्रकट करना चाहता हूँ क्योंकि यह केवल मेरा ही श्रम-फल नहीं है। इस काव्य प्रस्तुति को लयबद्ध और शैलीबद्ध कर इसको इसके प्रस्तुत रूप में लाने के लिए आपके द्वारा किये गए प्रयास उल्लेखनीय हैं और मेरे द्वारा इस पुस्तक का लिखा जाना आपका आशीर्वाद ही है।

अब बात करते हैं द्रौपदी की, महाभारत की वह घटना जो शर्मशार करती है किसी भी समाज को। सम्मान के वातावरण में नारी का कोमल, प्रेममय और ममत्व से भरा व्यक्तित्व जो मेरे ह्रदय में एक विशेष स्थान रखता है, तो दूसरी ओर यदि अपमान या शोषण की स्थिति पैदा होती है तो मुझे उसका काली रूप देखने की अभिलाषा होती है। अभिलाषा ही क्यों, अगर ईश्वर सब जगह है तो मेरी उससे यही प्रार्थना है कि वह नारी के इस रूप का समाज को दर्शन कराता रहे। अन्यथा, यह नर प्रधान समाज बड़ा उद्दंड है जो आज भी नारी को तुच्छ और हीन दृष्टि से देखता है। यही भावना मुझे पांचाली प्रतिज्ञा लिखने को प्रेरित करती है।

द्रौपदी चीरहरण भारत के पुरातन इतिहास का वह हिस्सा है जो मुख्य रूप से कुरुक्षेत्र जैसे विनाश का कारण बना, यद्यपि अन्य कारण भी हैं। और मुझे ये भी लगता है कि वह ऐसा समय था जब मानव मूल्य अपने अतल तक गिर चुके थे। यह समय, मुझे लगता है कि अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, शोषण, लालच इन सभी मानवीय अवगुणो के चरम वाला समय था। शायद, इसीलिए भगवान् कृष्ण उस काल में अवतरित हुए।

द्रौपदी समकालीन नारी दशा और समाज की नारी के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाने वाला पात्र है। यह एक बड़ी विडंबना है कि राजकुल की एक स्त्री जो स्वयं राजसी वैभव की अधिकारी है, भरी राजसभा में स्वजनों के बीच अपमानित की जाती है। राजकुल की पुत्री और बहु एक अबला नारी की तरह अवाक् खड़ी रह जाती है। यदि राजकुल की नारी की इतनी दयनीय स्थिति है तो एक सामान्य नारी की स्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। मेरे काव्य हृदय को नारी का अबला रुप पसंद नहीं, इसलिए मैंने द्रौपदी चीरहरण घटना को हमेशा उस दृष्टि से देखा जहां वह एक वीरांगना है और स्वयं के सम्मान के लिए लड़ना जानती है। और रही बात भगवान् कृष्ण की जो चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाते हैं, क्या ईश्वर की कृपा किसी और रूप में नहीं हो सकती?

यदि भगवान में साड़ी देने की क्षमता है तो क्या वह एक नारी को काली या दुर्गा रूप नहीं दे सकते? इसलिए मुझे वस्त्र हरण के समय द्रौपदी का दुर्गा रूप प्रत्यक्ष नज़र आता है जो मेरे विश्वास की शाश्वत शक्ति को और बल देता है तथा ईश्वर की शून्यता को और अनंत पर ले जाता है।

एक और बात कि मैंने एक और अगला पृष्ठ "शुभाशीष" नाम से इस पुस्तक में जोड़ा है जो अभी खाली है। मूलतः यह पन्ना मेरी अभिलाषा का सूचक है और यह अभिलाषा है पाठकों से आशीष पाने की। इसी अभिलाषा की श्रृंखला में मैं चाहता हूँ की यह पुस्तक हिंदी भाषा के सेवकों तक पहुंचे और उनसे आशीष पाने में कसौटी पर खरी उतरे, जिसको अगले मुद्रण में प्रकाशित किया जा सके।

 

                                                                          - राहुल राजपूत
                                                   स्वतंत्रता दिवस, १५ अगस्त २०१९
                                        नीमराना (राजस्थान)

 


 

मंगल स्तुति


रमापति, मुरली वाले, केशव, माधव, मधुसूदन,
दयानिधि, दुःख हरने वाले, लक्ष्मीकांत, पंकजलोचन,
पद्मनाभ, राधा के श्याम, कुञ्जबिहारी, मनमोहन,
पार्थ सारथी, त्रिविक्रम, सब नाम तुम्हारे सम्मोहन।
सुमेध, सुरेशम, रूप विशेषम, चक्र सुदर्शन-धारी,
द्वारिकाधीश, नटवर नागर, रास रचैया, बनवारी,
मुकुंद, मुरारी, योगीश्वर, सांवरिया, तुम गिरधारी,
श्रीकांत, तुम श्रीश्रेष्ठ, गोविन्द, गोकुल अघहारी।।
हे वैकुण्ठनाथ, उर के प्राण, नैय्या हमारी जलधि, तारो।
देवकीनंदन, हे बृजनंदन, इस भक्त का वंदन स्वीकारो।।
कभी पले हमारे मन में, द्वेष, दम्भ, छल, निम्न भाव।
हों स्वच्छ निर्मल सब के मन, आचार शुद्ध, सरल स्वभाव।।
करुणा दया हृदय बसे, मिट जाए मन से स्वार्थ भाव।
खुशी से रहें सभी नारी नर, सौहार्द का हो अभाव।।

श्याम, कृष्ण, मोहन मेरे, सदा रहो तुम साथ।
कभी कुपथ पग धरूँ, चलो पकड़ कर हाथ।।
मन से मैं लेता रहूं, सदा श्याम का नाम।
श्याम नाम में बस रहे, सब तीरथ सब धाम।।


मुक्तक

 

नारी एक सुन्दर सदग्रन्थ,
क्यों हाय! पुरुष ने न बाँचा
नारी है गरिमा सृष्टि की,
नारी है संस्कृति का साँचा

नारी मृदु भावों का संगम,
नारी को हाय अबल जाँचा!
नारी वसुधा - अमृत - सरिता,
नारी जननी, जीवन-साँचा।

नर नारी हैं निशा दिवा से,
पूर्ण नहीं, पूरक होते हैं
नर नारी ही दोनों मिलकर,
इस अपूर्णता को खोते हैं


नर का जीवन यदि कानन है,
नारी जीवन सुरभित उपवन
नर है कठोर, कर्मठ जग में,
नारी करती जीवंत सदन।

पांचाली प्रतिज्ञा- प्रथम सर्ग

  

राजमहल एक सुन्दर शोभित,
भूतल से छूता था अम्बर
दीप समान लगी थीं मणियाँ,
जगमग जगमग बाहर भीतर

महल शिखर पर लगी पताका,
पवन वेग से होती फर-फर
भीतर फैली चन्दन की गंध,
बाहर रवि किरणों का निर्झर

द्वार, कपाट, गवाक्ष, झरोखे,
शोभित थे रवि आभा पाकर।
जगमग प्रकाश में चमक रहे,
थे सजे कनक से जड़ित शिखर।

छज्जों से लटके थे सुन्दर;
झूमर, झालर, दीप-आधार।
खम्बों पर चढ़ खेल रहीं थीं,
स्वर्ण लताओं की भरमार

राजमहल का इंद्रधनुष-सा,
सुन्दर था अति तोरण द्वार
भित्ति-दृश्य में उद्धृत वैभव,
और विभूतियों की जयकार

अट्टालिकाओं से घिरा महल,
था गंगा तट से कुछ हटकर
एक ओर कानन, कल कल जल,
था एक ओर विस्तीर्ण नगर

दिनमान डूबने चला क्षितिज में,
किया दृश्य सुन्दर साकार
संध्या आगमन की वेला में,
महल का निखरा और आकार

अरुण लालिमा छायी नभ में,
ईश्वर की संरचना प्यारी
एक जीवन का अंत कहो या,
नव जीवन की यह तैयारी

मंदिर में बज उठी घंटियाँ,
डमरू, मंजीरे और करताल
शंखनाद संग स्वर गूंजे,
जय महाकाल, जय महाकाल

गंगा की लहरों से उठती,
कल कल जल की मृदु झंकार
बहने लगी शांत संध्या में,
प्रभु गीतों की मधुर बयार।

चाँद निकल आया अम्बर में,
दीपों से महल हुआ रोशन।
चंद्र प्रभा में धुला धुला-सा,
खिल उठा नगर मंजुल नूतन।

श्वेत सुधाकर श्याम गगन में,
भू पर बहती मृदुल बयार।
गली, डगर, पथ आलोकित थे,
जैसे सुन्दर दीप - त्यौहार!

नगर कांतिमय शांत चतुर्दिक,
सुन्दर भवनों से घिरा हुआ।
नगर द्वार पर था अति सुन्दर;
वाक्य 'स्वागतम्' लिखा हुआ।

नृप कुरु के कर्मों से सिंचित,
भूमि पुरुषार्थी शूरों की।
हस्तिनापुर राजधानी थी,
रण-पटु बलशाली वीरों की

महल द्वार पर खड़े हुए थे,
अपराह्न से रथ वीरों के।
लगा निशाने रहे सारथी,
सब अनुमानों के तीरों के।

द्वारपाल तैनात द्वार पर,
अंदर था वीरों का जमघट
सभा चल रही थी प्रदोष में,
क्या विपदा आकर पड़ी विकट?

तभी अचानक दुर्योधन का,
अट्टहास खुशी से फूट पड़ा।
राजसभा में आज अचानक,
यह किस पर संकट टूट पड़ा?

द्यूत खेल था राजसभा में,
कौरव, पांडव थे प्रतिद्वंदी
बिन भाला, असि, तीर के कौरव,
सब जीत रहे थे संपत्ति।

नृप बैठे थे सिंघासन पर,
थे कोटि वीर आजू बाजू।
किसे पता दरबार बिकेगा,
काल खड़ा था लिए तराजू।

काल बड़ा बलशाली जग में,
यह नित दिखलाये खेल नया।
कुटिल काल जब चालें चलता,
फिर इसे न आये तनिक दया।

कुटिल चाल के विषफन जब भी,
राजद्वार तक आ जाते हैं।
राजा अगर न मारे उनको,
राजसुतों को खा जाते हैं।

जब जब लख कर अनाचार को,
नृप आँखे बंद कर लेता है।
विनाश बनकर महाकाल तब,
भू शोणित से भर देता है।

गुरु, ज्ञानी, नीतिवानों के,
ज्ञान के सब सागर सूखे।
भरी सभा में नृप के सम्मुख,
अपनों ने ही अपने लूटे।

वहां सभी विद्वान, मनीषी,
ज्ञानी, तेजस्वी गुरुगण थे।
दोनों पालो में बैठे जो,
कुल-भूषण, वीर धुरंधर थे।

बिसात बिछी थी चौसर की,
जमी थी प्रतिद्वंदी टोली।
काल सर्प डस गया, द्यूत में,
जब लगी द्रौपदी की बोली।

बदल गया सब मंजर पल में,
रंग भरी सभा का उतर गया।
दांव द्रौपदी लगी द्यूत में,
सुनकर सन्नाटा बिखर गया।

धर्मराज न समझ सके कि,
यह किसका दांव लगा डाला।
भूल गया वह कुल मर्यादा,
मर्यादा को जिसने पाला।

धर्मनीति पर चलने वाली,
वह सभा बनी एक मौन कुटी।
पूर्ण सभा में एक विरोधी,
भी न कहीं आवाज़ उठी!

धर्माचार्य, विद्वान, नीतिविद,
वे तर्क कोई भी दे न सके।
सब चेहरों से रोष दिखाते,
पर मुख से कुछ भी कह न सके।

चाह कर भी अन्याय रुका न,
अब समय तो पासा फेंक चुका।
भरी सभा में स्वयं राजा भी,
ईमान की पगड़ी बेच चुका।

अब पांचाली की बाजी भी,
धर्मराज युधिष्ठिर हार गए।
एक शोर मच गया सभा में,
वे हार भी अपनी नार गए।

इधर तो पांडव कुल बेचारा,
बस अपना माथा पीट रहा।
और उधर कपटी दुर्योधन,
वह खुश हो होकर चींख रहा।

जीत द्यूत में पांचाली को,
वह मदहोशी में उछल रहा।
कि आग्रह अप्राप्त वस्तु का,
मानो वर्षों में सफल हुआ।

पर उसकी नीयत पल भर भी,
संतोष तनिक न धरती थी।
चाह पांचाली पाने की,
बेचैन उसे अति करती थी।

वह नीच तानकर सीने को,
छलपूर्ण जीत पर फूल रहा।
उस खल की आँखों में केवल,
पांचाली-आनन घूम रहा।

न्याय-धीश सब सहमे बैठे,
नियति की कैसी बेइमानी?
पिछले सभी हिसाब चुकाने,
विकल हुआ निर्लज्ज कामी।

इंगित कर के द्वारपाल को,
तब दंभित दुर्योधन बोला
जाओ, पांचाली से बोलो-
पहिने वो दासी का चोला।

धारण कर दासी का चोला,
वह शीघ्र सभा में आ जाये।
हर्ष, विजय की इस वेला में,
वह विजय गीत मेरे गाये।


कहना कि युधिष्ठिर हार गए,
उनसे दुर्योधन जीत गया।
कोई नही अब तेरा जग में,
कि हार तेरा हर मीत गया।


 

पांचाली प्रतिज्ञा- द्वितीय सर्ग

 

राजभवन में उधर द्रौपदी,
द्यूत क्रीड़ा से थी अनजान
सजा रही थी वह केशों को,
बन कर एक दर्पण की शान

नयनों में काजल भर उसने,
था किया घटाओं को फीका
और तेजस्वी ललाट पर अपने,
खींचा एक कुमकुम का टीका

फिर देख नयन मृग से अपने,
हर्षित हो अधरों को भींचा
निरख निरख अपने यौवन को,
आनंदित नयनों को मींचा

मंद-मंद स्मित से उसके,
मृदु गालों में खिल उठे भंवर
हो लालायित लटक रही लट,
छूने को कोमल लाल अधर

ज्वाला-सी सुशोभित थी उसके,
केशों में सीमन्त-लाल-रेख।
अभिमान शिखर पर था उसका,
कांतिमय मुख और भाल देख।

आनन बिजली सा चमक रहा,
श्रृंगार की आभा को पाकर।
लगता था जैसे बैठी हो,
सुंदरता की देवी आकर।

दो कमल कली सी थी आँखे,
भ्रूं थीं काले सृप के फन-सी।
वे धरा गगन सी लगती थीं,
उठती गिरती पलकें उसकी।

नैन नक्श तीखे कटार से,
था सुन्दर कोमल निर्मल तन
अग्निकुंड से वह जन्मी थी,
था अंग-अंग कुंदन-कुंदन

सर्वश्रेष्ट धन्वी की संगिनी,
वो पांडव कुल की आन थी।
था द्रुपद पिता द्रौपदी का,
वो उत्तुंग-शिखर-अभिमान थी।

अनभिज्ञ काल की घातों से,
वह उस संध्या समय विशेष।
पूजन की तैयारी में थी,
पूजा में था कुछ समय शेष।

प्रदोष काल की कुलीन सेज,
ले आयी संग मलिन सन्देश
क्या पता काल का क्रूर वार,
कर दे किसको कब निःशेष!

दरवाजे पर दस्तक देकर,
पांचाली को किया प्रणाम
कैसे कहे जो कहने आया,
खड़ा असमंजस में दरबान

सकुचाया! दरवान कि कैसे,
वह आँखों देखा हाल कहूँ।
चाल चली जो दुर्योधन ने,
मैं कैसे उसकी चाल कहूँ।

बोली पांचाली- नर बोलो,
तुम क्या संदेशा लाये हो?
निःसंकोच बताओ सब कुछ,
तुम इतना क्यों सकुचाये हो?

हे रानी, मैं कैसे बोलूं?
हैं घटना क्रम ही कुछ ऐसे।
आज हुआ है जो महलों में,
वह तुम्हे बताऊँ मैं कैसे?

आया हूँ मैं तुम्हे सुनाने,
दुर्योधन का एक आदेश
आना होगा राजसभा में,
यही नियति का है सन्देश

रानी सुनो, आज महलों में,
एक द्यूत-युद्ध हुआ भारी।
हार गए महाराज युधिष्ठिर,
अपनी हर एक बाजी हारी।

फिर दांव लगाया स्वयं का ही,
भ्राता संग, लेकिन हार गए।
जाने क्या हुआ उन्हें रानी,
कि खाली सारे वार गए।

दांव लगाया था फिर जिसका,
क्या कहूँ, लाज बस आती है।
हे रानी! बतलाऊँ कैसे?
ये छाती फटी सी जाती है।

पांचाली रानी का अंतिम,
हा! राजा दांव लगा बैठे।
था दैव! आज क्या भाग्य में,
वह यह भी दांव गंवा बैठे।

सुनकर अपना नाम द्यूत में,
रानी पांचाली सिहर उठी।
नजर अँधेरा ही बस आया,
जिस ओर जिधर भी नज़र उठी।

पांचाली के आकुल मन में,
घनघोर वेदना उमड़ पड़ी
सुनकर हाल द्यूत-क्रीड़ा का,
वह निश्चल-सी रह गयी खड़ी।

हो विस्मित पांचाली बोली,
क्या दाँब लगा दी पांचाली?
क्या अभद्र बात तुम करते हो!
बोली आँखों में भर लाली।

धर्मराज हैं धर्म मूर्ती,
बतला रहे तुम कैसा हाल?
हे नर! तुम सब सच सच बोलो,
छल, कपट, दुर्योधन की चाल?

अब पांचाली के नयनों में,
बिजली-सा क्रोध कौंध आया
बड़ी वेदना, भारी मन से,
तब द्वारपाल ने बतलाया।

खेल द्यूत का खेल रहे थे,
फिर पड़ा खेल कर पछताना।
इधर सभी पांडव थे रानी!
कौरव कुल उधर सभी स्याना।

धर्मराज पांडव दल से थे,
कौरव दल से शकुनि मामा
पासे फेंक रहा था शकुनि,
कटु चालें बदल बदल नाना।

कुटिल दांव शकुनि के रानी,
उस खेल में बाजी मार गए।
पासे की चालों में पांडव,
सब राज खजाना हार गए।

सब हार गया हूँ यह कहकर,
जब धर्मराज उठ खड़े हुए
शकुनि बोला, हे ज्येष्ठ श्रेष्ठ,
हैं शेष ताज सर चढ़े हुए

पासे फेंके फिर शकुनि ने,
वह ताज भी सारे जीत गया।
सबने समझा अब तो सारा,
ही खेल द्यूत का बीत गया।

लेकिन हे रानी शकुनि ने,
था एक षड़यंत्र रचा भारी।
उसने उन पासों में जाने,
क्या कर रखी थी तैयारी!

उसने अपने लंग पाँव पर,
मुश्किल से ही खुद को तोला
सहसा शकुनि बड़े जोश से,
तब आसन से उठकर बोला-

हे धर्मराज! क्यों तुम अपना,
इतना कम मूल्य आंकते हो?
खेलो लगा स्वयं की बाजी,
क्यों रण छोड़कर भागते हो?

सुनकर शकुनि के कूट वचन,
हो धर्मराज लाचार गए।
पहले तो वह स्वयं को हारे,
फिर अनुजों को भी हार गए।

हार गए जब धर्मराज तो,
शठ शकुनि हर्षित हुआ विशेष
कपटी बोला धर्मराज से,
अभी तो है पांचाली शेष

हे रानी! कथनी सच है कि,
ये नाश काल जब आता है
शिक्षक, विद्वान, मनीषी हो,
वह मूढ़ मति बन जाता है

हाँ, धर्मराज अति व्याकुल थे,
फिर हासिल कैसे यहाँ करें।
आतुर हो दाँब लगा बैठे,
वे वहाँ आपका, क्षमा करें।

हे रानी! आज्ञा दो, बोलूं
है नहीं ठीक मेरा कहना
लगता पासे मान रहे थे,
केवल शकुनि का ही कहना।

शकुनि के पासो में क्या था,
कि एक न खाली वार गया!
पासे जब फेंके शकुनि ने,
पांडव कुल फिर से हार गया।

हार गए जब पांडव रानी,
थे बजा रहे कौरव ताली
कहूँ नियति या नर-लाचारी?
विस्मित हूँ रानी पांचाली!

विस्मित-दृग, अवाक द्रौपदी,
थी सम्मुख दर्पण खड़ी हुयी।
दर्पण पार कुपित नयनों की,
अक्षि नयनों पर गड़ी हुयी।

आँखों में ज्वार, उठता विचार,
करता उसका अन्तः प्रहार
पर नियति के इस कटु सत्य को,
कह मिथ्या, कैसे दे नकार?

सुनकर ये वर्णन पांचाली,
रह गयी छली-सी खड़ी हुई।
उसके थे प्रश्न कई मन में,
वह गहन सोच में पड़ी हुई।

लगा स्वयं की बाजी खेलें,
तो खेलें वो, इंकार नही।
वो दांव लगाएं नारी का,
किंचित उनको अधिकार नही।

जो दाँब लगा दे नारी का,
नर नही क्या वह तुच्छ अति दीन?
मन से मलीन, कर्म से विहीन,
स्वाभिमान है उसका क्षीण

नारी का श्रृंगार मान है,
और मान बिना पहिचान नही।
नारी वो मृत, बेजान यहाँ,
जिस नारी का सम्मान नही।

जो दांव लगाए संगिनी का,
यूं हया उतर जाए सर से।
उस न्याय-सभा में पांचाली,
क्या मांगे स्वयं बिके नर से?

पांचाली का प्रश्न स्वयं से,
संबंध क्या नर का नारी से?
यदि हृदय में प्रेम नही है,
क्या बंधन पति का प्यारी से?

प्रेम से बंधते नर नारी,
प्रेम से ही ये मनुजता है।
अन्यथा, नर नारी को क्या,
वस्तु-सा बेच भी सकता है?

समझा था मैंने प्रेम जिसे,
क्या नर भी उसे समझता है?
मन का विकार है प्रेम यहाँ,
या स्वार्थ ही नर में बसता है?

पांचाली बोली सेवक से,
हे सेवक बापस तुम जाओ।
है एक प्रश्न मेरा उनसे,
तुम उसे पूछ कर फिर आओ।


जब सब कुछ जीत लिया उनसे,
उनका दुर्योधन निष्ठुर ने।
फिर दांव लगाया था किसका,
पहले महाराज युधिष्ठिर ने?

जिस दम पासे खेल रहे थे,
वे लगा दांव न्यारे न्यारे।
पांचाली दांव लगी पहले,
या, पहले स्वयं को वे हारे?

यदि हार स्वयं को पहले ही,
उन ने दासत्व स्वीकार किया।
पांचाली दांव लगाने का,
किसने उनको अधिकार दिया?

  

पांचाली प्रतिज्ञा- तृतीय सर्ग

 

राजसभा ने द्वारपाल से,
पांचाली का प्रश्न सुना।
होकर शर्मिंदा धर्मराज का,
लाचार, दीन-सा शीश झुका।

सुन पांचाली का प्रश्न यह,
हो गयी विमूढ़ स्तब्ध सभा
न्याय, तर्क से आँख मूंदकर,
वह रोक रही द्वन्द अंतर का।

विद्वान पंडितों की मंडली,
चुप बैठी, कुछ ना बोल रही
एक नारी नर निर्मित नीति,
मानो तिल-तिल कर तोल रही

छा गया सभा में कुछ पल को,
हा! आत्म-ग्लानि का मौन सघन
प्रश्न जटिल था, क्या उत्तर दें?
कर रहे तर्क पर सभी मनन।

पांचाली का प्रश्न खरा था,
तर्कसंगत था, तर्क बड़ा था
पर वाणी पर राजसभा के,
तालों का अम्बार जड़ा था

वह केवल एक प्रश्न नहीं था,
था कटु सत्य का वह आघात
एक वीर भी नहीं सभा में,
जो बोल सके सच, सत्य बात?

देख सभा को असहाय विकल,
यह कहते हुए उठा विकर्ण-
द्यूत व्यसन की आग में सबका,
क्या ज्ञान धर्म हो गया भस्म?

न्याय-दायिनी राजसभा क्यों,
धर छाती पर बैठी पत्थर?
क्या नहीं यहाँ ज्ञानी गुरुजन,
जो दें पांचाली का उत्तर?

पल भर भूल पांचाली को,
हो प्रश्न यह यदि जनता का?
सभा बधिर-सी बनी रहे तो,
क्या नहीं दृश्य यह चिंता का?

राजसभा ही मुँह मोड़ेगी,
यदि नैतिक जिम्मेदारी से
कैसे चलेगी न्याय व्यवस्था,
यूं चुप्पी और लाचारी से?

न्याय न कर पाना प्रजा का,
नृप-पतन का सूचक होता है।
श्रृगाल-खाल को ओढ़ शेर,
अपनी ही गरिमा खोता है।

शब्द विकर्ण के लगे सभा को,
ज्यों पिनाक से निकले तीर।
होकर कठोर, कटु नृप-निंदा,
कर रहा सभा में विकर्ण वीर।

सुन विकर्ण के निष्ठुर बोल,
भर उठा कर्ण के मन में रोष।
कर्ण उठा सहसा बोला- हे!
लगा रहे तुम नृप पर दोष?

क्या है सही और क्या यथार्थ,
तुमको नही है कुछ भी बोध।
तुम अनुभव से शून्य, हे विकर्ण!
हो अभी सरल, बालक अबोध।

कर सभा को संबोधित 'गीदड़'
है स्वाभिमान तुमने कुचला
अरे विकर्ण! यह गढ़ वीरों का,
दौड़े हर छाती में चपला।

सिंह दन्त गिने जिस बालक ने,
तुम उसी भरत के वंशज हो।
करते हो क्यों बात अनर्गल?
तुम वीर कुरु के अंशज हो।

क्या हुआ है तुमको, हे विकर्ण!
मत भूलो भुजदंडो का बल।
हर्षोल्लास-विजय वेला में,
क्यों मन करते गंभीर प्रबल?

हे कर्ण! क्योंकि मैं देख रहा,
नभ में घिरते प्रलय के घन।
फिर तुम ही बोलो कैसे रखूँ,
मैं शांत चित्त और हर्षित मन।

कुरु सभा अपमानित करना,
हे कर्ण! न था मेरा व्यवहार
अन्याय हुआ एक नारी पर,
हुआ मैं यूं नृप-निंदाकार

यदि न्याय-मठ में ही न होगा,
धर्म, नीति और न्याय का वास।
जग में भला कौन रखेगा,
न्याय, नीति में फिर विश्वास?

बोलो, सच को अनदेखा कर,
दबा सका सत-शक्ति कौन?
उपस्थित यहाँ सभी उत्तर दें,
हे सभाजनों! मत बैठो मौन?

है प्रश्न द्रौपदी का सबसे,
पर नहीं एक भी यहाँ गंभीर?
इतिहास रच रहे हम ऐसा,
कहलाने को क्या भीरु-वीर?

धृतराष्ट्र, भीष्म, कृपाचार्य,
गुरु द्रोण सदृश हैं वीर यहाँ।
यदि कुल में ही न्याय न होगा,
फिर और कहीं पर न्याय कहाँ?

सुनकर विकर्ण के तर्कों को,
उठ खड़ा सभा में कोलाहल।
कानाफूसी, खुसर फुसर कर,
दे रहे सभी जन सत्य को बल।

कुछ शोर हुआ मंद जैसे ही,
क्रोध से भर कर बोला कर्ण।
द्रौपदी की बाजी नीतिबद्ध,
हो गये हो तुम मति-भ्रष्ट विकर्ण।

भीष्म, द्रोण-से विद्वानों को,
न्याय का मत दो तुम उपदेश।
सभी बड़े और ज्ञानी तुमसे,
उनका मानो मौन आदेश।

न अब आगे कुछ करो कुतर्क,
सही है दुर्योधन की जीत
ओ कौरव कुल चिराग, शांत!
स्वजनों से रखो कुछ तो प्रीत

हुआ कुपित अति द्वारपाल पर,
बोला दुर्योधन झुँझलाकर
हाँ हाँ, करे प्रश्न जितने भी,
पर करे सभा में ही आकर।

उठ, दुर्योधन ने ताव खींच,
दुःशासन को आदेश दिया
ला पांचाली को खींच अनुज,
बैठे हैं जिसके पांच पिया।

हे भ्राता मेरे कदमो में,
लाकर पांचाली को रख दे।
क्या होता है अपमान गरल,
इस भरी सभा को लखने दे।

उठा दुःशासन गर्वित हो कर,
कर्म भ्रात ज्येष्ठ ने श्रेष्ठ दिया।
क्या याद करेगी दुनिया भी,
दुर्योधन ने प्रतिशोध लिया।

छाती में एक तूफान उठा,
आँखों में प्रलय की हुंकार।
राजतन्त्र की देख विवशता,
भीष्म मारता बस फुंकार।

गज सा भाल, आँखो में ज्वाल,
रुधिर बिजली सा फड़क रहा
सौ गज पर भारी क्रुद्ध भीम
का सीना धड़ धड़ धड़क रहा

ललकार कहा दुर्योधन को,
ओ नीच! तेरी ऐसी मजाल?
छिन्न छिन्न कर दूँ अंग तेरा,
जो पांचाली का किया ख्याल।

विवश हुआ अर्जुन भी जिसकी,
धनु-विद्या छूती थी आकाश।
एक प्रत्यंचा अगर खींच दे,
ला सकता था महा विनाश।

झल्लाकर दुर्योधन बोला-
करते हो सभी बखान बड़ा!
इस पौरुष का पुरूस्कार दूँ,
या, दे दूँ तुमको दंड कड़ा?

दास बने अब तुम सब मेरे,
और द्रौपदी मेरी दासी है।
गवाह यहाँ विद्वत-जन की,
ये भीड़ भी अच्छी खासी है।
 

यह अनीति या अन्याय नही,
सब कुछ द्यूत में जीता है।
जीती है मैंने पांचाली भी,
बस समय अभी कुछ बीता है।

संवाद युधिष्ठिर यह सुनकर,
अति व्याकुल होते जाते थे।
दांव लगा दी क्यों पांचाली,
वे बार बार पछताते थे।

क्या होता है पछताने से,
जब समय निकल यह जाता है।
एक बार शर छूट गया जो,
वह लौट कहाँ फिर आता है?

इस व्यसन का था परिणाम यह,
बुद्धि ही उनकी गयी मारी।
नीति-न्याय को भूल द्यूत में,
हा! दांव लगा दी एक नारी।

देते हैं दोष हम औरों को,
जब काम बिगड़ कुछ जाता है।
किन्तु सत्य है स्वयं मनुज ही,
अपना भाग्य निर्माता है।

हाय! गयी मारी मति उनकी,
जो दाँब लगा दी पांचाली
बिलख रहे मन ही मन पांडव,
हा! पांच पुरुष अति बलशाली

विदुर उठ दुर्योधन से बोले-
क्या कुकर्म क्षत्रिय को भाते हैं?
नारी को अपमानित करते,
वे लोग रसातल जाते हैं।

क्या भूल गए हो दुर्योधन,
तुम धर्म और मानवता को?
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,
रमन्ते तत्र देवता' को?

हे विदुर! नीति के तुम ज्ञाता,
बस नीति ही अंगीकार करो।
ये सभा गवाह, मैं जीता हूँ,
तुम जीत मेरी स्वीकार करो।
  

श्री विदुर बोले– धिक्कार मुझे,
यदि जीत तेरी स्वीकार करूँ।
छोड़ नीति और नैतिकता को,
मैं अनीति अंगीकार करूँ!

फिर स्वर दुर्योधन का गूंजा,
क्रोध और तिरस्कृति से मिश्रित।
अरे नीति में निपुण विदुर तुम,
मत भूलो, हो मेरे आश्रित।

विदुर कहो वो क्या नैतिकता,
जो दे न सके सबको सम्मान?
लिया अंगूठा एकलव्य का,
अर्जुन धनुर्धर रहे महान!

नैतिकता है तप का जीवन,
बस जी सकता फक्कड़ फ़कीर।
यश के लालायित पत्थर पर,
क्या कभी खींच पाये लकीर!

ये वही सभा, वही लोग हैं,
सब नीति-नियम रचने वाले।
जाति-पाति का भेदभाव कर,
नर प्रतिभा को छलने वाले।

जो ठुकराती बाहुबल को,
वो नैतिकता ठुकराता हूँ
विदुर! मैं बाहुबल-विश्वासी,
पौरुष को हृदय लगाता हूँ।

है राज-वीथियों में बल ही,
नियम-नैतिकता का आधार
अगर नही ये, नही किया क्यों,
वीर कर्ण-सा फिर स्वीकार?

पांडवों को इंगित कर बोला,
क्या नही यहाँ सबने देखा?
दासों में भी बसती ज्वाला,
क्या कुल, क्या हाथों की रेखा!


तभी हुआ कुछ कोलाहल-सा,
जिसमें नारी का क्रंदन था।
ला रहा दुःशासन उसे खींच,
जिसका इस कुल में वंदन था।

समर्पण

  जिनसे पाकर जीवन मैंने, अब तक देखे कई वसंत। समर्पित उनको यह काव्य-फल, करता हूँ प्रणाम अनंत।। फिर जीवन के एक वसंत में, हे साथी! जब तुम आ...