Sunday, September 12, 2021

भूमिका

 

     प्रत्यक्ष है कि भूमिका प्रायः किसी भी पुस्तक लेखन का अंतिम चरण है। आज स्वतंत्रता दिवस का पावन पर्व भी है और यह काव्य पुस्तक भी लगभग मेरी लेखनी से स्वतंत्र होने वाली है। वैसे तो द्रौपदी चीरहरण की घटना से जन जन परिचित है, फिर भी मेरा उत्तरदायित्व है कि मैं भूमिका के माध्यम से वह सब संक्षिप्त में बताऊँ जिसे शायद हर पाठक जिज्ञासावश जानना चाहता है। वह जिज्ञासा है पूर्वाभास, कारण या प्रेरणा जो किसी भी लेखक के कान में कहती है- लिखो।

बात यह तब की है जब मैं IIT में पढ़ रहा था और मैंने द्रौपदी चीरहरण पर कुछ लिखना चाहा। यह वही समय था जब निर्भया जैसे निर्मम अपराधों के प्रति जनता में क्रोध था, रोष था। एक दो कविताएं मैनें भी लिखी फेसबुक पर सांझा करने के उद्देश्य से। और उसी श्रृंखला में द्रौपदी पर दो चार छंद लिखे और छोड़ दिये। लेकिन यह मेरे मस्तिष्क में हमेशा रहा कि वह कविता पूर्ण करनी है लेकिन कब? इसका मुझे भी कुछ पता न था। यह मेरी कल्पना के परे था कि उस समय लिखे कुछ अधूरे छंद इस खंडकाव्य की नींव बन जाएंगे। शायद मैंने तो उसको केवल फेसबुक के लिए ही लिखना शुरू किया था। यह एक पुस्तक रूप में मेरे सामने आएगी, यह अकल्पनीय था और इसे मैं उस शून्य रूप की कृपा मानता हूँ जो शब्दों को काव्य की माला में गुंथवाती है।

इसको लिखते समय कबीर दास जी का एक दोहा सतत मेरे चित में रहा-

मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ।

चारों जुग कै महातम कबीरा मुखहिं जनाई बात।।

क्योंकि आज के समय में इस दोहे की प्रथम पंक्ति को चरितार्थ करना बड़ा सरल है। और इस पुस्तक के लेखन में यह पंक्ति सटीक बैठती है क्योंकि यह पुस्तक लैपटॉप और मोबाइल पर ही लिखी गयी।

मुझे लगता है की यह काव्य रुपी माला तरह तरह के फूलों से गूँथी हुई है। अगर सामन्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाए तो हो सकता है कि यह माला बड़ी ही अजीब मालूम पड़े क्योंकि इसमें कहीं बड़ा फूल है तो कहीं छोटा। कही लाल है तो कहीं सफ़ेद। ये तो कुछ खिचड़ी सी ही नज़र आती है। परन्तु, मैं आपसे वादा करता हूँ कि इसकी खुशबू ताजे फूलों की ही है। इसी श्रृंखला में मैं अपने पिताजी का कोटि कोटि आभार प्रकट करना चाहता हूँ क्योंकि यह केवल मेरा ही श्रम-फल नहीं है। इस काव्य प्रस्तुति को लयबद्ध और शैलीबद्ध कर इसको इसके प्रस्तुत रूप में लाने के लिए आपके द्वारा किये गए प्रयास उल्लेखनीय हैं और मेरे द्वारा इस पुस्तक का लिखा जाना आपका आशीर्वाद ही है।

अब बात करते हैं द्रौपदी की, महाभारत की वह घटना जो शर्मशार करती है किसी भी समाज को। सम्मान के वातावरण में नारी का कोमल, प्रेममय और ममत्व से भरा व्यक्तित्व जो मेरे ह्रदय में एक विशेष स्थान रखता है, तो दूसरी ओर यदि अपमान या शोषण की स्थिति पैदा होती है तो मुझे उसका काली रूप देखने की अभिलाषा होती है। अभिलाषा ही क्यों, अगर ईश्वर सब जगह है तो मेरी उससे यही प्रार्थना है कि वह नारी के इस रूप का समाज को दर्शन कराता रहे। अन्यथा, यह नर प्रधान समाज बड़ा उद्दंड है जो आज भी नारी को तुच्छ और हीन दृष्टि से देखता है। यही भावना मुझे पांचाली प्रतिज्ञा लिखने को प्रेरित करती है।

द्रौपदी चीरहरण भारत के पुरातन इतिहास का वह हिस्सा है जो मुख्य रूप से कुरुक्षेत्र जैसे विनाश का कारण बना, यद्यपि अन्य कारण भी हैं। और मुझे ये भी लगता है कि वह ऐसा समय था जब मानव मूल्य अपने अतल तक गिर चुके थे। यह समय, मुझे लगता है कि अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, शोषण, लालच इन सभी मानवीय अवगुणो के चरम वाला समय था। शायद, इसीलिए भगवान् कृष्ण उस काल में अवतरित हुए।

द्रौपदी समकालीन नारी दशा और समाज की नारी के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाने वाला पात्र है। यह एक बड़ी विडंबना है कि राजकुल की एक स्त्री जो स्वयं राजसी वैभव की अधिकारी है, भरी राजसभा में स्वजनों के बीच अपमानित की जाती है। राजकुल की पुत्री और बहु एक अबला नारी की तरह अवाक् खड़ी रह जाती है। यदि राजकुल की नारी की इतनी दयनीय स्थिति है तो एक सामान्य नारी की स्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। मेरे काव्य हृदय को नारी का अबला रुप पसंद नहीं, इसलिए मैंने द्रौपदी चीरहरण घटना को हमेशा उस दृष्टि से देखा जहां वह एक वीरांगना है और स्वयं के सम्मान के लिए लड़ना जानती है। और रही बात भगवान् कृष्ण की जो चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाते हैं, क्या ईश्वर की कृपा किसी और रूप में नहीं हो सकती?

यदि भगवान में साड़ी देने की क्षमता है तो क्या वह एक नारी को काली या दुर्गा रूप नहीं दे सकते? इसलिए मुझे वस्त्र हरण के समय द्रौपदी का दुर्गा रूप प्रत्यक्ष नज़र आता है जो मेरे विश्वास की शाश्वत शक्ति को और बल देता है तथा ईश्वर की शून्यता को और अनंत पर ले जाता है।

एक और बात कि मैंने एक और अगला पृष्ठ "शुभाशीष" नाम से इस पुस्तक में जोड़ा है जो अभी खाली है। मूलतः यह पन्ना मेरी अभिलाषा का सूचक है और यह अभिलाषा है पाठकों से आशीष पाने की। इसी अभिलाषा की श्रृंखला में मैं चाहता हूँ की यह पुस्तक हिंदी भाषा के सेवकों तक पहुंचे और उनसे आशीष पाने में कसौटी पर खरी उतरे, जिसको अगले मुद्रण में प्रकाशित किया जा सके।

 

                                                                          - राहुल राजपूत
                                                   स्वतंत्रता दिवस, १५ अगस्त २०१९
                                        नीमराना (राजस्थान)

 


 

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